> परमात्मा और जीवन"ईश्वर के साथ हमारा संबंध: सरल ज्ञान और अनुभव: 2026

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बुधवार, 7 जनवरी 2026

जानकी कृपा कटाक्ष स्तोत्र

           🌺 जानकी कृपा कटाक्ष स्तोत्र 🌺


(सीता माता के कृपा-दृष्टि के लिए अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र)

यह स्तोत्र माता सीता (जानकी) की करुणा, कृपा और रक्षा की याचना हेतु पढ़ा जाता है। इसे प्रतिदिन सुबह या शाम, स्वच्छ स्थान पर, दीपक जलाकर श्रद्धा से पढ़ें।

॥ जानकी कृपा कटाक्ष स्तोत्र ॥

जय सीता-राम

श्रीमती जानकी देवीं !
शरणागतवत्सले !
प्रसन्ना भव मे नित्यं
रमया सहिताऽनघे !! १ !!

कृपा कटाक्ष-दृष्ट्या त्वं
शरण्ये भक्तवत्सले !
प्रसन्ना भव मे नित्यं
जनकस्य आत्मजा शुभे !! २ !!

रक्ष रक्ष जगन्मातः
मम त्वं भक्तवत्सले !
त्वया रक्षतः सर्वं
मम शत्रु विनश्यतु !! ३ !!

त्वत्पाद-पंकज-द्वन्द्वं
भजामि सततं मुदा !
सीते त्वं करुणा-मूर्ते !
दीनानाथ विनोदिनि !! ४ !!

जानकी त्वं जगद्बीजं,
भाव्या सर्वार्थसिद्धये !
त्वत्पाद-रजसाऽऽलभ्यं
सर्वं स्यादिति मे ध्रुवम् !! ५ !!

त्वं माता सर्वलोकानां
त्वं नाथा सर्वसिद्धिदा !
त्वत्पाद-हृदयानन्दं
लब्ध्वा मोदं उपेयुषे !! ६ !!

इति स्तुत्वा महाभागां
सीतां भक्त्या समन्वितः !
प्राप्नुयात्सकलान् कामान्
विद्या आरोग्यम् ऐश्वर्यम् !! ७ !!

॥ इति श्री जानकी-कृपा-कटाक्ष-स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

पाठ के लाभ

🌼 फायदे और फल:

  • घर में शांति और सुख प्रदान करता है
  • जीवन में अड़चनों और बाधाओं को दूर करता है
  • दांपत्य प्रेम और सामंजस्य बढ़ाता है
  • आर्थिक और मानसिक स्थिरता देता है
  • संतान, विवाह और संतान-सुख में सहायक

कैसे और कब पढ़ें

📿 दिन: मंगलवार, शुक्रवार या नवरात्रि में विशेष फल
🕯 स्थान: राम-सीता के चित्र या मंदिर के सामने
🪔 संकल्प: "सीता राम" का स्मरण

माला: तुलसी या रुद्राक्ष
समर्पण: पीला पुष्प, अक्षत, चंदन

संक्षिप्त मंत्र

जिन्हें पूरा स्तोत्र न आता हो, वे यह लघु-स्तुति रोज पढ़ें:

"सीते रामाभिरामे शुभदाम नमो नमः"

।।जय सियाराम।।

मंगलवार, 6 जनवरी 2026

यज्ञ और हवन में अंतर | Yagya aur Havan Difference in Hindi

            🔥 यज्ञ और हवन में अंतर 

जानिए धार्मिक, आध्यात्मिक और व्यवहारिक भेद


✨ भूमिका

हिंदू धर्म में यज्ञ और हवन दोनों ही अग्नि से जुड़ी पवित्र क्रियाएँ हैं। अक्सर लोग इन दोनों शब्दों को एक-दूसरे के स्थान पर उपयोग कर लेते हैं, जबकि शास्त्रों के अनुसार यज्ञ और हवन में स्पष्ट अंतर है।

इस लेख में हम सरल भाषा में समझेंगे कि

👉 यज्ञ क्या है

👉 हवन क्या है

👉 और दोनों में वास्तविक अंतर क्या है

🔱 यज्ञ क्या है?

 एक विस्तृत वैदिक अनुष्ठान है, जिसमें:

अग्नि

मंत्र

देवताओं का आवाहन

ब्राह्मणों की उपस्थिति

और विशेष विधि-विधान

का पालन किया जाता है।

यज्ञ का उद्देश्य होता है:

देवताओं को प्रसन्न करना

लोककल्याण

वर्षा, शांति और समृद्धि की कामना

📖 शास्त्रों में यज्ञ को कर्मकांड की सर्वोच्च साधना माना गया है।

🔥 हवन क्या है?

हवन, यज्ञ का ही एक सरल और संक्षिप्त रूप है।

इसे सामान्य गृहस्थ भी:

घर में

मंदिर में

या पूजा के अंत में

आसानी से कर सकता है।

हवन में:

अग्नि प्रज्वलन

घी, तिल, समिधा की आहुति

सरल मंत्र

का प्रयोग होता है।

अग्नि पूजा का आध्यात्मिक अर्थ

📌 यज्ञ और हवन में मुख्य अंतर (तालिका)

विषय

यज्ञ

हवन

स्वरूप

विस्तृत वैदिक अनुष्ठान

सरल अग्नि पूजा

विधि

जटिल, शास्त्रानुसार

आसान, घरेलू

समय

कई घंटे या दिन

15–30 मिनट

स्थान

विशेष यज्ञशाला

घर या मंदिर

उद्देश्य

लोककल्याण, देवपूजन

शुद्धि, शांति

कर्ता

विद्वान पंडित

कोई भी श्रद्धालु

🕉️ आध्यात्मिक दृष्टि से अंतर

🔸 यज्ञ

सामूहिक चेतना का जागरण

ब्रह्मांडीय संतुलन

समाज और प्रकृति का कल्याण

🔸 हवन

व्यक्तिगत शुद्धि

मानसिक शांति

नकारात्मक ऊर्जा का नाश

👉 सरल शब्दों में कहें तो:

यज्ञ = समाज के लिए

हवन = स्वयं के लिए

🌿 क्या हवन भी यज्ञ माना जा सकता है?

हाँ,

हवन को यज्ञ का लघु रूप कहा जा सकता है,

लेकिन हर यज्ञ हवन नहीं होता।

जैसे:

हर नदी जल है

लेकिन हर जल नदी नहीं

वैसे ही:

हर हवन यज्ञ का अंश है

पर हर यज्ञ केवल हवन नहीं

🌸 दैनिक जीवन में महत्व

आज के समय में:

रोज़ाना हवन करना संभव है

बड़े यज्ञ कम ही होते हैं

लेकिन भाव और श्रद्धा सबसे महत्वपूर्ण है।

सच्चे मन से किया गया छोटा हवन भी

बड़े यज्ञ के समान फल दे सकता है।

🪔 निष्कर्ष

यज्ञ और हवन दोनों ही अग्नि साधना के पवित्र मार्ग हैं,

अंतर केवल:

विस्तार

उद्देश्य

और विधि

का है।

जहाँ यज्ञ समाज को जोड़ता है,

वहीं हवन आत्मा को परमात्मा से जोड़ता है।

🙏 श्रद्धा संदेश

अग्नि को साक्षी मानकर किया गया हर कर्म

हमें शुद्ध, सकारात्मक और ऊर्जावान बनाता है 🔥✨

❓ FAQ Section (Featured Snippet Ready)

❓ यज्ञ और हवन में मुख्य अंतर क्या है?

👉 यज्ञ एक विस्तृत वैदिक अनुष्ठान है, जबकि हवन उसका सरल रूप है।

❓ क्या हर हवन यज्ञ होता है?

👉 हवन को यज्ञ का अंश माना जाता है, लेकिन हर यज्ञ केवल हवन नहीं होता।

❓ क्या घर में हवन करना उचित है?

👉 हाँ, शुद्ध भाव और सही विधि से घर में हवन किया जा सकता है।

❓ यज्ञ कौन कर सकता है?

👉 यज्ञ सामान्यतः विद्वान पंडितों द्वारा किया जाता है।

❓ हवन का आध्यात्मिक लाभ क्या है?

👉 मानसिक शांति, आत्मशुद्धि और सकारात्मक ऊर्जा।

मकर संक्रांति का महत्व | Makar Sankranti Significance in Hindi

     🌞 मकर संक्रांति का महत्व

सूर्य, साधना और सकारात्मक परिवर्तन का पावन पर्व


✨ मकर संक्रांति क्या है?

मकर संक्रांति भारत के प्रमुख धार्मिक और खगोलीय पर्वों में से एक है। यह पर्व हर साल 14 या 15 जनवरी को मनाया जाता है, जब सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इसी के साथ सूर्य का उत्तरायण आरंभ होता है, जिसे अत्यंत शुभ माना गया है।

मकर संक्रांति केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि अंधकार से प्रकाश और नकारात्मकता से सकारात्मकता की यात्रा का प्रतीक है।

🌾 मकर संक्रांति क्यों मनाई जाती है?

1️⃣ सूर्य उत्तरायण का आरंभ

इस दिन से सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होते हैं। शास्त्रों में उत्तरायण को

👉 देवताओं का दिन और

👉 आध्यात्मिक उन्नति का समय माना गया है।

2️⃣ फसल और परिश्रम का सम्मान

यह पर्व किसान और प्रकृति से गहराई से जुड़ा है। नई फसल के आगमन पर:

ईश्वर को धन्यवाद

धरती के प्रति कृतज्ञता

व्यक्त की जाती है।

3️⃣ पुण्य काल का महत्व

मकर संक्रांति के दिन:

दान

स्नान

जप

ध्यान

का विशेष महत्व है। कहा जाता है कि इस दिन किया गया दान अक्षय फल देता है।

🕉️ धार्मिक दृष्टि से मकर संक्रांति

गंगा स्नान का विशेष पुण्य

सूर्य देव की उपासना

तिल और गुड़ का दान

महाभारत में भीष्म पितामह ने उत्तरायण की प्रतीक्षा कर शरीर त्याग किया था, जिससे इस दिन का आध्यात्मिक महत्व और बढ़ जाता है।

🍬 तिल और गुड़ का आध्यात्मिक अर्थ

तिल – पापों का नाश

गुड़ – मधुरता और प्रेम

“तिल-गुड़ खाओ, मीठा-मीठा बोलो”

यह वाक्य जीवन में कटुता छोड़ने और मधुर व्यवहार अपनाने का संदेश देता है।

🪁 मकर संक्रांति की परंपराएं

सूर्य को अर्घ्य देना

तिल-गुड़ का दान

खिचड़ी बनाना

पतंग उड़ाना

गरीबों को अन्न, वस्त्र और धन दान

🧘‍♀️ आध्यात्मिक संदेश

मकर संक्रांति हमें सिखाती है:

जीवन की दिशा बदलने का साहस

अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ना

आत्मशुद्धि और अनुशासन

यह पर्व कहता है:

जब सूर्य दिशा बदल सकता है, तो हम क्यों नहीं?

🌸 मकर संक्रांति और स्वास्थ्य

सर्दी के मौसम में:

तिल

गुड़

घी

शरीर को ऊर्जा और गर्मी प्रदान करते हैं। यह पर्व शरीर और आत्मा दोनों के संतुलन का संदेश देता है।

🌼 निष्कर्ष

मकर संक्रांति एक ऐसा पर्व है जो:

प्रकृति

परिश्रम

परमात्मा

तीनों को जोड़ता है। यह हमें जीवन में नई शुरुआत, सकारात्मक सोच और आध्यात्मिक उन्नति की प्रेरणा देता है।

🙏 मकर संक्रांति की शुभकामनाएं

सूर्य देव का प्रकाश

आपके जीवन से अंधकार दूर करे

और मन में नई ऊर्जा भर दे 🌞✨

मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं

❓ FAQ Section (Google Friendly)

❓ मकर संक्रांति कब मनाई जाती है?

👉 मकर संक्रांति हर साल 14 या 15 जनवरी को सूर्य के मकर राशि में प्रवेश पर मनाई जाती है।

❓ मकर संक्रांति क्यों मनाई जाती है?

👉 सूर्य उत्तरायण की शुरुआत, फसल का आगमन और दान-पुण्य के महत्व के कारण।

❓ मकर संक्रांति पर तिल-गुड़ क्यों खाया जाता है?

👉 तिल पापों के नाश और गुड़ जीवन में मिठास का प्रतीक है।

❓ क्या मकर संक्रांति पर दान का विशेष फल मिलता है?

👉 हाँ, शास्त्रों के अनुसार इस दिन किया गया दान अक्षय फल देता है।

❓ मकर संक्रांति का आध्यात्मिक संदेश क्या है?

👉 नकारात्मकता छोड़कर सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ना।

🔗 लोहड़ी पर्व 

🔗 अग्नि पूजा का आध्यात्मिक अर्थ

अग्नि पूजा का आध्यात्मिक अर्थ क्या है? जानिए अग्नि देव का महत्व, आत्मशुद्धि, त्याग और ईश्वर से जुड़ाव का रहस्य।

🔥 अग्नि पूजा का आध्यात्मिक अर्थ (आत्मशुद्धि, संकल्प और ईश्वर से जुड़ाव)


✨ अग्नि पूजा क्या है?

“अग्नि पूजा – आत्मशुद्धि और समर्पण की साधना”

अग्नि पूजा हिंदू धर्म की एक अत्यंत प्राचीन और पवित्र साधना है। वैदिक काल से ही अग्नि को देवताओं का मुख (देवमुख) माना गया है। यज्ञ, हवन, विवाह, गृहप्रवेश, लोहड़ी जैसे सभी शुभ संस्कार अग्नि के बिना अधूरे माने जाते हैं।

अग्नि केवल आग नहीं, बल्कि ईश्वरीय चेतना और जीवन शक्ति का प्रतीक है।

🕉️ शास्त्रों में अग्नि का स्थान

ऋग्वेद की प्रथम ऋचा ही अग्नि की स्तुति से आरंभ होती है:

“अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्।”

अर्थात — मैं अग्नि देव की स्तुति करता हूँ, जो यज्ञ के पुरोहित और देवताओं तक हमारी प्रार्थनाएँ पहुँचाने वाले हैं।

🔥 अग्नि पूजा का गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ

लोहड़ी पर्व का महत्व हमें अग्नि पूजा के आध्यात्मिक अर्थ को समझने का अवसर देता है।

1️⃣ आत्मशुद्धि का प्रतीक

अग्नि सब कुछ जलाकर शुद्ध कर देती है।

आध्यात्मिक रूप से यह:

विकार

अहंकार

नकारात्मक विचार

को जलाकर शुद्ध आत्मा का निर्माण करती है।

2️⃣ ईश्वर से सीधा संवाद

अग्नि को माध्यम माना गया है, जिसके द्वारा हमारी:

प्रार्थनाएँ

संकल्प

भावनाएँ

सीधे परमात्मा तक पहुँचती हैं।

3️⃣ अहंकार की आहुति

अग्नि में समर्पण का अर्थ है:

“मैं” को त्याग कर “तू” को स्वीकार करना

जब हम आहुति देते हैं, तब वास्तव में हम अपने भीतर के अहंकार, क्रोध और लोभ को समर्पित करते हैं।

4️⃣ जीवन ऊर्जा (प्राण शक्ति) का जागरण

अग्नि शरीर की:

पाचन शक्ति

तेज

उत्साह

की प्रतीक है। संतुलित अग्नि जीवन को ऊर्जावान बनाती है।

5️⃣ साक्षी भाव की शिक्षा

अग्नि सिखाती है:

जलते रहो, पर आसक्त न हो

साक्षी बनो, भोगी नहीं

यह वैराग्य और विवेक का मार्ग दिखाती है।

🌿 अग्नि पूजा में सामग्री का प्रतीकात्मक अर्थ

घी – पवित्रता और त्याग

तिल – पापों का क्षय

समिधा – साधना और अनुशासन

गुड़ – जीवन की मिठास

🌸 दैनिक जीवन में अग्नि पूजा का भाव


हर व्यक्ति अग्नि पूजा कर सकता है:

दीपक जलाकर

भोजन से पहले स्मरण कर

मन में नकारात्मक विचारों को छोड़कर

यही सच्ची अग्नि साधना है।

🪔 अग्नि पूजा का आध्यात्मिक संदेश

जो स्वयं को जला देता है, वही दूसरों को प्रकाश देता है।

अग्नि बनो — उजाला फैलाओ, राख नहीं।

अग्नि पूजा आत्मशुद्धि और अहंकार त्याग की वैदिक साधना है।

🌼 निष्कर्ष

अग्नि पूजा हमें सिखाती है कि जीवन में:

त्याग से शक्ति आती है

शुद्धता से शांति

और समर्पण से परमात्मा की अनुभूति

अग्नि हमारे भीतर के देवत्व को जाग्रत करने का माध्यम है।

FAQ Section (Featured Snippet Ready)

❓ अग्नि पूजा क्यों की जाती है?

👉 अग्नि पूजा आत्मशुद्धि, नकारात्मकता के नाश और ईश्वर से जुड़ने के लिए की जाती है।

❓ अग्नि को देवता क्यों माना गया है?

👉 अग्नि को देवताओं तक प्रार्थना पहुँचाने वाला माध्यम माना गया है, इसलिए उसे देवमुख कहा गया है।

❓ हवन में घी और तिल क्यों डाले जाते हैं?

👉 घी त्याग और पवित्रता का प्रतीक है, जबकि तिल पापों के क्षय का संकेत देता है।

❓ क्या घर में दीपक जलाना भी अग्नि पूजा है?

👉 हाँ, श्रद्धा और शुद्ध भाव से दीपक जलाना सरल अग्नि साधना मानी जाती है।

❓ अग्नि पूजा का संबंध जीवन से कैसे है?

👉 अग्नि जीवन ऊर्जा, पाचन शक्ति और आत्मबल का प्रतीक है।

लोहड़ी पर्व का महत्व | Lohri Festival in Hindi | परमात्मा और जीवन

 🔥 लोहड़ी पर्व का महत्व: प्रकृति, कृतज्ञता और नवजीवन का उत्सव


✨ लोहड़ी क्या है?

लोहड़ी भारत का एक प्रमुख लोकपर्व है, जो विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा, हिमाचल और उत्तर भारत में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पर्व हर साल 13 जनवरी को आता है और सर्दियों के अंत तथा फसल के नए चक्र की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है।

लोहड़ी मुख्य रूप से अग्नि, सूर्य और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व है।

🌾 लोहड़ी क्यों मनाई जाती है?

लोहड़ी मनाने के पीछे कई धार्मिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक कारण हैं:

1️⃣ फसल और प्रकृति का सम्मान

रबी की फसल (गेहूं) की बुवाई पूरी होने के बाद किसान प्रकृति और ईश्वर को धन्यवाद देते हैं। यह पर्व मेहनत के फल की आशा का प्रतीक है।

2️⃣ सूर्य उत्तरायण की शुरुआत

लोहड़ी के बाद सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है और दिन बड़े होने लगते हैं, जिससे सकारात्मक ऊर्जा और नई शुरुआत का संकेत मिलता है।

3️⃣ अग्नि पूजा का महत्व

अग्नि पूजा का आध्यात्मिक अर्थ क्या है? जानिए अग्नि देव का महत्व, 

लोहड़ी की अग्नि में तिल, मूंगफली, गुड़ अर्पित कर अग्निदेव को नमन किया जाता है। यह बुराइयों के नाश और शुद्धता का प्रतीक है।

🔥 लोहड़ी की परंपराएं

लकड़ी और उपलों से अग्नि प्रज्वलन

तिल, मूंगफली, रेवड़ी, गुड़ का अर्पण

ढोल की थाप पर भांगड़ा और गिद्दा

परिक्रमा कर सुख-समृद्धि की कामना

👶 नवविवाहितों और नवजात के लिए विशेष लोहड़ी

जिन घरों में पहली लोहड़ी होती है (नवविवाहित जोड़ा या नवजात शिशु), वहाँ यह पर्व और भी विशेष माना जाता है। रिश्तेदार उपहार, मिठाइयाँ और आशीर्वाद देते हैं।

🕉️ धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि

लोहड़ी हमें सिखाती है:

प्रकृति के साथ सामंजस्य

अग्नि को साक्षी मानकर नकारात्मकता का त्याग

सामूहिकता और प्रेम

यह पर्व अहंकार की आहुति देकर जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का संदेश देता है।

🪔 लोहड़ी का आध्यात्मिक संदेश

जैसे अग्नि में तिल-गुड़ अर्पित कर मिठास बढ़ती है,

वैसे ही जीवन में प्रेम, त्याग और कृतज्ञता से आत्मा उज्ज्वल होती है।

🌸 निष्कर्ष

लोहड़ी केवल एक लोकपर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, परिश्रम और परमात्मा के प्रति धन्यवाद का उत्सव है। यह हमें याद दिलाती है कि जीवन में हर ठंड के बाद एक नई गर्माहट और हर अंधकार के बाद प्रकाश अवश्य आता है।

🙏 लोहड़ी की शुभकामनाएं

आप सभी को लोहड़ी की हार्दिक शुभकामनाएं,परमात्मा आपके जीवन में सुख, स्वास्थ्य और समृद्धि प्रदान करें 🌾🔥

FAQ Section (Google Featured Snippet Friendly)

❓ लोहड़ी कब मनाई जाती है?

👉 लोहड़ी हर साल 13 जनवरी को मनाई जाती है, मकर संक्रांति से एक दिन पहले।

❓ लोहड़ी क्यों मनाते हैं?

👉 लोहड़ी फसल, सूर्य देव, अग्नि देव और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का पर्व है।

❓ लोहड़ी में आग क्यों जलाई जाती है?

👉 अग्नि शुद्धिकरण, नकारात्मक ऊर्जा के नाश और शुभता का प्रतीक मानी जाती है।

❓ लोहड़ी किन राज्यों में मनाई जाती है?

👉 पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली और उत्तर भारत में प्रमुख रूप से।

❓ पहली लोहड़ी का क्या महत्व है?

👉 नवविवाहित जोड़े और नवजात शिशु के लिए पहली लोहड़ी अत्यंत शुभ मानी जाती है।

सकट चौथ क्यों मनाया जाता है? | संकष्टी चतुर्थी का महत्व

 सकट चौथ क्यों मनाया जाता है? | Sakta Chauth Vrat Mahatva


भूमिका

हिंदू धर्म में व्रत-त्योहार केवल परंपरा नहीं, बल्कि आस्था, विश्वास और संस्कारों का प्रतीक होते हैं। सकट चौथ, जिसे संकष्टी चतुर्थी भी कहा जाता है, माताओं द्वारा अपनी संतान की रक्षा, लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए किया जाने वाला अत्यंत पावन व्रत है।

सकट चौथ क्यों मनाते हैं?

1. संतान की लंबी आयु और सुरक्षा के लिए

सकट चौथ का व्रत मुख्य रूप से माताएँ अपनी संतान के लिए करती हैं। मान्यता है कि इस दिन व्रत करने से बच्चों पर आने वाले सभी प्रकार के संकट दूर होते हैं और उन्हें स्वस्थ व दीर्घायु जीवन प्राप्त होता है।

2. भगवान गणेश की कृपा पाने के लिए

यह व्रत भगवान श्री गणेश को समर्पित होता है, जिन्हें विघ्नहर्ता कहा जाता है। सकट चौथ के दिन गणेश जी की पूजा करने से जीवन की बाधाएँ, दुख और मानसिक परेशानियाँ दूर होती हैं।

3. संकटों से मुक्ति के लिए

“संकष्टी” शब्द का अर्थ ही होता है – कष्टों से छुटकारा। इस दिन व्रत रखने से परिवार में आने वाली परेशानियाँ, रोग और नकारात्मक ऊर्जा कम होती है।

4. मातृत्व प्रेम और त्याग का प्रतीक

यह व्रत माँ के निस्वार्थ प्रेम, त्याग और समर्पण का प्रतीक है, जहाँ माँ अपने कष्ट सहकर संतान के सुख की कामना करती है।

सकट चौथ से जुड़ी पौराणिक कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक समय माता पार्वती ने अपने पुत्र गणेश जी को संकट से बचाने के लिए यह व्रत किया था। माता के व्रत और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान गणेश ने उन्हें वरदान दिया कि जो भी माता इस दिन श्रद्धा से व्रत करेगी, उसकी संतान सदैव सुरक्षित रहेगी। तभी से सकट चौथ का व्रत संतान-सुख देने वाला माना जाता है।

सकट चौथ का व्रत कौन करता है?

माताएँ अपनी संतान के लिए

कई स्थानों पर पिता भी परिवार की सुख-शांति के लिए

कुछ महिलाएँ विवाह, स्वास्थ्य और मनोकामना पूर्ति के लिए भी करती हैं

सकट चौथ व्रत का फल

संतान की रक्षा और दीर्घायु

घर में सुख-शांति और समृद्धि

जीवन के कष्टों और विघ्नों में कमी

भगवान गणेश की विशेष कृपा 🌼

निष्कर्ष

सकट चौथ केवल एक व्रत नहीं, बल्कि माँ और संतान के बीच अटूट प्रेम और विश्वास का पर्व है। यह हमें सिखाता है कि सच्ची श्रद्धा और विश्वास से हर संकट पर विजय पाई जा सकती है।

।।श्री गणेश।।

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