कल्याण–बौद्ध प्रेरक ग्रंथ में से

                    जीवन का कम्बल 

दो साधु थे किसी भक्त ने दोनों को बहुमूल्य गर्म कंबल उपहार मैं दिए दिन भर यात्रा करने के बाद दोनों साधु रात को धर्मशाला में ठहरे। सर्दी की रात थी। जब सोने का समय हुआ तो एक साधु ने सोचा कि कंबल कीमती है कहीं ऐसा ना हो की रात के समय कोई चुरा ले जाए। उसने लपेटकर तह करके सिरहाने लगाया और सो गया।दूसरा साधू जब सोने लगा तब उसने देखा कि सर्दी से कुछ बच्चे कांप रहे थे और उनके दांत किटकिटा रहे थे, साधु को दया आ गई, उसने अपना कंबल उन ठिठुरते हुए अनाथ बच्चों उड़ा दिया।

            सुबह जब दोनों साधु उठे तब दोनों में से किसी के पास कंबल नहीं था।एक ने अपनी इच्छा ए बच्चों को ओढ़ा दिया था और दूसरे के सिर के नीचे से किसी ने खिसका लिया था। अपनी इच्छा से अपना कंबल त्यागने वाला प्रसन्न था,परन्तु चोरी हो गए कंबल का मालिक साधु बहुत दुखी था।

यह जीवन रूपी कंबल भी एक न एक दिन सबसे छिन जाता है,इस संसार से वियोग तो निश्चित है,इसलिए जो स्वेच्छा से सांसारिक पदार्थो में आसक्ति को त्याग देता है,उसे कोई दुख नहीं व्याप्ता,पर जो उससे चिपटा रहता है, वह सदा ही दुखी रहता है।

(कल्याण , बोधकथा अंक से)


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