वैदिक प्रार्थना
तत्त्वबोधपरक प्रार्थनाएं आत्मज्ञान, भक्ति और परमात्मा से जुड़ने का मार्ग दिखाती हैं। जानिए इन प्रार्थनाओं का गहरा अर्थ और आध्यात्मिक महत्व हिंदी में।
ॐ पूर्णमद: पूर्नमिदम् पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवाविष्यते।।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।
ॐ वह (परब्रह्म)पूर्ण हैं,यह ( कार्यब्रह्म)भी पूर्ण हैं; क्योंकि पूर्ण से पूर्ण ही निकलता है,(प्रलय काल में) पूर्ण(कार्यब्रह्म)- का पूर्णत्व लेकर पूर्ण (परब्रह्म)ही शेष रहता है।ॐ शांति शांति शांति। (यजुर्वेद)
ॐ सह नाववतु।सह नौ भुनक्तु।सह वीर्य करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।
ॐ वह प्रसिद्ध परमेश्वर हम शिष्य और आचार्य दोनों की साथ-साथ रक्षा करें। हम दोनों को साथ-साथ विद्या के फल का भोग कराए। हम दोनों एक साथ मिलकर वीर्य यानी विद्या की प्राप्ति के लिए सामर्थ्य प्राप्त करें। हम दोनों का पढ़ा हुआ तेजस्वी हो हम दोनों परस्पर द्वेष ना करें ओम शांति शांति।।( कृष्ण यजुर्वेद)
ॐ असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्योर्मामृतं गमयेति।
असत् से मुझे सत् की और ले चलो, अंधेरे से मुझे प्रकाश की ओर ले चलो मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो (बृहदारण्यकोपनिषद)
ॐ त्र्यंबकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।
दिव्य गंध से युक्त, मृत्युरहित, धन–धान्य वर्धक,त्रिनेत्र रुद्र की हम पूजा करते है।वे रुद्र हमें अपमृत्यु और संसार रूप मृत्यु से मुक्त करें।जिस प्रकार ककड़ी का फल अत्यधिक पक जाने पर अपने डंठल से मुक्त हो जाता हैं,उसी प्रकार हम भी मृत्यु से छूट जाए;किंतु अभ्युदय और नि:श्रेयसरुप अमृत से हमारा संबंध न छूटने पाए।(यजुर्वेद)
ॐ भूर्भुव स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्।।
सत् चित्, आनन्द स्वरुप और जगत के श्रृष्टा ईश्वर के सर्वोत्कृष्ट तेज का हम ध्यान करते है। वे हमारी बुद्धि को शुभ प्रेरणा दे।।(यजुर्वेद)
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षःशान्तिः पृथ्वी शन्तिराप: शन्तिरोषध्य: शान्तिः।
वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिः सर्वम शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।।
द्युलोक शान्त हो; अंतरिक्ष शांत हो,पृथ्वी शांत हो,जल शांत हो, औषधियाँ शांत हो, वनस्पतियाँ शांत हो, समस्त देवता शांत हो, ब्रह्म शांत हो, सब कुछ शांत हो, शांत–ही– शांत हो और मेरी वह शांति निरंतर बनी रहें।(यजुर्वेद)
बौद्ध–प्रार्थना
नमो तस्स भगवतो अर्हतो सम्मा सम्बुद्धस्स।
नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स॥
नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स॥
बुद्धं शरणं गच्छामि। धम्मं शरणं गच्छामि।
सङ्घं शरणं गच्छामि।
दुतियम्पि बुद्धं शरणं गच्छामि।
दुतियम्पि धम्मं शरणं गच्छामि।
दुतियम्पि सङ्घं शरणं गच्छामि।
ततियम्पि बुद्धं शरणं गच्छामि।
ततियम्पि धम्मं शरणं गच्छामि।
ततियम्पि सङ्घं शरणं गच्छामि।
पाणातिपाता वेरमणि सिक्खापदं समादियामि।
अदिन्नादाना वेरमणि सिक्खापदं समादियामि।
कामेसु मिच्छाचार वेरमणि सिक्खापदं समादियामि।
मुसावादा वेरमणि सिक्खापदं समादियामि।
सुरामेरय मज्जपमादट्ठाना वेरमणि सिक्खापदं समादियामि।
🌸 अर्थ (सरल हिंदी में)
मैं बुद्ध, धम्म (धर्म) और संघ की शरण में जाता/जाती हूँ।
मैं पाँच नियमों का पालन करने का संकल्प लेता/लेती हूँ —
हिंसा न करना, चोरी न करना, गलत आचरण से बचना, झूठ न बोलना, नशा न करना।
मैं सभी प्राणियों के सुख और कल्याण की कामना करता/करती हूँ।
आप सबका दिन शुभ हो।


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जय श्री राधे