क्या आपका 'मानसिक कप' भरा हुआ है? (Is your mental cup full?)
कहानी: "खाली कप और अधूरा ज्ञान"
एक शहर में एक बहुत ही सफल नौजवान रहता था। उसके पास सब कुछ था—पैसा, शोहरत और सुख-सुविधाएं, लेकिन उसे हमेशा लगता था कि उसे सब कुछ पता है। वह दूसरों की सलाह सुनना पसंद नहीं करता था।
एक दिन वह एक एकांत पहाड़ी पर रहने वाले एक बुजुर्ग गुरु से मिलने गया। वहां जाकर उसने गुरुजी को अपनी उपलब्धियां गिनानी शुरू कर दीं और अंत में कहा, "मैं यहाँ आपसे कुछ नया सीखने आया हूँ, लेकिन मुझे लगता है कि मैं पहले से ही बहुत कुछ जानता हूँ।"
गुरुजी मुस्कुराए और बोले, "सीखने से पहले थोड़ी चाय पीते हैं।"
गुरुजी ने युवक के सामने एक कप रखा और केतली से चाय डालनी शुरू की। कप भर गया, लेकिन गुरुजी चाय डालते रहे। चाय कप से बाहर निकलकर फर्श पर बहने लगी।
युवक चिल्लाया, "रुकिए! आप क्या कर रहे हैं? कप भर चुका है, अब इसमें एक बूंद भी नहीं आ सकती!"
गुरुजी शांत भाव से बोले, "बिल्कुल इस कप की तरह, तुम भी अपने ज्ञान और अहंकार से पूरी तरह भरे हुए हो। जब तक तुम अपना कप (दिमाग) खाली नहीं करोगे, तब तक मैं तुम्हें कुछ भी नया कैसे सिखा सकता हूँ?"
युवक को अपनी गलती समझ आ गई। उसने महसूस किया कि व्यक्तिगत विकास के लिए सबसे पहली शर्त है—'सीखने की इच्छा और विनम्रता'।
इस कहानी से सीख (Moral):
हमारा दिमाग एक पैराशूट की तरह है, यह तभी काम करता है जब यह खुला हो। व्यक्तिगत विकास के लिए यह मानना ज़रूरी है कि हमें अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है।

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जय श्री राधे