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प्रभु का स्वभाव कैसा होता है?

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                                                                                                             प्रभु का स्वभाव भगवान श्री राम का कथन हैं कि कोई भी मुझसे मित्रता के लिए हाथ बढ़ाये तो मैं इंकार नहीं कर सकता हूँ , फिर चाहे  उसमे दोष ही क्यों न हो। मैं जब जीवों को अपनाता हूँ , जीव जब पूर्ण रूप से आत्मसमर्पण कर  देता हैं तब वह निर्दोष हो जाता हैं। शरणागत को प्रभु के सन्मुख रहना चाहिए। हर समय प्रभु के श्री  मुख को भक्त देखा करता हैं और प्रभु भक्त को देखते रहते हैं। इस प्रकार के भक्त को सन्मुख कहते हैं। सन्मुख भक्त के सभी पाप -ताप नष्ट हो जाते हैं। विमुख प्राणी ईश्वर से पीठ करके रहता हैं , तो प्रभु भी उससे पीठ कर लेते हैं।                 भक्तो के...

वेद शास्त्रों की विस्तृत जानकारियाँ

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वेद शास्त्रो की विस्त्तृत जानकारी                                            प्र.1- वेद किसे कहते है ? उत्तर- ईश्वरीय ज्ञान की पुस्तक को वेद कहते है। प्र.2- वेद-ज्ञान किसने दिया ? उत्तर- ईश्वर ने दिया। प्र.3- ईश्वर ने वेद-ज्ञान कब दिया ? उत्तर- ईश्वर ने सृष्टि के आरंभ में वेद-ज्ञान दिया। प्र.4- ईश्वर ने वेद ज्ञान क्यों दिया ? उत्तर- मनुष्य-मात्र के कल्याण के लिए। प्र.5- वेद कितने है ? उत्तर- चार प्रकार के । 1-ऋग्वेद 2 - यजुर्वेद 3- सामवेद 4 - अथर्ववेद प्र.6- वेदों के ब्राह्मण । वेद ब्राह्मण 1 - ऋग्वेद - ऐतरेय 2 - यजुर्वेद - शतपथ 3 - सामवेद - तांड्य 4 - अथर्ववेद - गोपथ प्र.7- वेदों के उपवेद कितने है। उत्तर - वेदों के चार उप वेद है । वेद उपवेद 1- ऋग्वेद - आयुर्वेद 2- यजुर्वेद - धनुर्वेद 3 -सामवेद - गंधर्ववेद 4- अथर्ववेद - अर्थवेद प्र 8- वेदों के अंग हैं कितने होते है । उत्तर - वेदों के छः अंग होते है । 1 -...

भजन- गोवर्धन वासी सांवरे तुम बिन रहा न जाए-------

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श्री कृष्ण प्रेमियों के लिए बहुत ही काम की बात:-) तुम्हारे इस पद का कम से कम एक वर्ष तक भाव से नित्य पाठ व गायन करने वाले को मेरे दर्शन अवश्य होंगे ही :- हमारे प्यारे श्री कृष्ण का अष्ट छाप के कवियों मे चर्तुभुज दास जी को ये वचन दिया है ऐसा नाभा जी ने इनकी जीवनी मे लिखा है क्यों न लाभ लिया जाय !   "जय श्री राधे" गोवर्धनवासी सांवरे तुम बिन रह्यो न जाये । — हे गोवर्धनवासी श्री कृष्ण, अब मैं आपके बिना नही रह सकता बंकचिते मुसकाय के सुंदर वदन दिखाय । लोचन तलफें मीन ज्यों पलछिन कल्प विहाय ॥१॥ — आपकी इस सुन्दर छवि ने मेरा मन मोह लिया है औ र आपकी मुस्कान में मेरा चित्त अटक गया है । जैसे मछली बिना पानी के तडपती है वैसे ही मेरी आँखौ को आपसे बिछडने की तडपन हो रही है र मेरा एक एक पल कल्प के समान बीत रहा है । सप्तक स्वर बंधान सों मोहन वेणु बजाय । सुरत सुहाई बांधि के मधुरे मधुर गाय ॥२॥ — हे मोहन आपकी वंशी की धुन सेकडौ संगीत स्वरौ से अोतप्रोत मधुर गीत गा रही है। रसिक रसीली बोलनी गिरि चढ गाय बुलाय । गाय बुलाई धूमरी ऊंची टेर सुनाय ॥३॥ — आप जब पर्वत पर चढकर गायौं को ...

पवित्र जीवन जीने के साधन कौन-कौन से हैं

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                                                                                                        पवित्र जीवन का जीने की कला विचारो की पवित्रता -                               मालिक तेरी रजा रहे और तू ही तू रहे                                बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे।                         जब तक कि तन में जान रंगों में लहू रहे ,                         तेरा  ही जिक्र हो और तेरी जुस्तजू रहे।। हमारा कर्तव्य है कि हम प्रत्येक कार्य ...

भगवान के नाम की क्या महिमा है भाग 2

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एक व्यक्ति वृन्दावन जा रहा था दूसरे ने पैसे देकर  उससे कहा  कि मेरे लिए एक तुलसी की माला लेते आना। अभी माला आई नहीं, नाम का जप शुरू नहीं किया केवल विचार मात्र ही किया था कि इतने से ही यमराज ने कहा  चित्रगुप्त  उस माला मांगने वाले के खाते को ख़त्म कर दो। महाराज उसे तो बहुत कर्मो के फल भोगने हैं , यमराज बोले नहीं क्योंकि उसने नाम जप का संकल्प ले लिया हैं , उसपर कृपा हो गयी हैं। उस जीव के कर्म बंधन समाप्त हो गए हैं। यही हैं कलयुग में नाम का महत्व।  दुष्ट चित्त से स्मरण किया गया भी भगवन्नाम भी पापो का नाश करता हैं। जैसे अनजाने में भी अग्नि को स्पर्श करने पर हाथ जल जाता हैं। अतः 'हरि 'यह नाम हैं। जो सभी के पाप तापो को हर लेते हैं। हरि नाम के संबोधन में हरे ऐसा रूप होता हैं जो मन को हर लेता हैं।  हरे राम हरे राम , राम राम हरे हरे।  हरे कृष्ण हरे कृष्ण , कृष्ण कृष्ण हरे हरे।। मन्त्र का अर्थ हैं हरे मतलब हे राधे। कृष आकर्षण करने वाला 'ण 'आनन्ददायक। सबको आकृष्ट करके आनन्द देने वाले का नाम कृष्ण हैं।  'रा 'का उच्चारण करने से पाप ...

भगवान के नाम की महिमा क्या होती है भाग एक

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               परमार्थ के पत्र -पुष्प (भगवान  के नाम  महिमा ) एक सेठ अपने घर की दुकान के कार्य में इतना व्यस्त था कि उन्हें नाम लेने की फुरसत नहीं मिलती थी। जब वह toilet में जाता तो उसे फुरसत मिलती थी और वह राम राम रटते। श्री हनुमानजी को क्रोध आया कि कामों को छोड़ नहीं सकता हैं और टॉयलेटमें राम राम करता हैं। हनुमानजी ने उसकी पीठ पर एक लात मारी। रात्रि के समय श्री हनुमानजी , श्री रामजी की सेवा करने लगे तो , जब श्री राम जी की पीठ पर हाथ लगाया तो श्री रामजी करहाने लगे , पीठ में बहुत पीड़ा हैं। बहुत पूछने पर श्री रामजी ने बताया जब मेरा भक्त कीर्तन कर रहा था तो तुमने मारा  था , अगर उस मार को मैं अपने ऊपर न लेता तो तुम्हारी मार से वो बेचारा मेरा भक्त तो मर ही जाता। अतः मेने उसकी रक्षा की। उसकी मार को अपने ऊपर ले लिया। हनुमानजी ने भूल स्वीकार करके क्षमा याचना की। सेठ को राम नाम का उपासक माना , आदर किया। तात्पर्य यह हैं कि राम जप पवित्र -अपवित्र सभी अवस्था में लिया जा सकता हैं। पर दुःख इसी बात का हैं कि फिर भी हम नाम जप का ...

क्या आप वृंदावन से दूर रहकर भी वृंदावन वास चाहते हैं?

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                                                                                                                  वृन्दावन वास 'आशा जाकी जँह बसी तँह ताहि को वास ' मन श्री वृन्दावन में रहे। प्रारब्धवश शरीर बाहर हैं, तो यह वृन्दावन वास ही हैं और यदि शरीर वृन्दावन में हैं ,मन बाहर हैं तो यह उत्तम धाम वास नहीं कहा जायेगा। धाम से बाहर रहने से मन में प्रभु का ध्यान बना हुआ हैं तो प्रभु आपके पास ही हैं। आनन्दमय भगवदधाम में भगवान के नाम , रूप , लीला के सर्वत्र दर्शन होते हैं। अनन्य भक्त अपने घर में रहकर नाम , रूप , लीला का अनुभव करते हैं। उनका घर का निवास , धाम निवास के तुल्य हैं।                     अनंत गुण संपन्न परमात्मा आप सबका कल्याण करे। भगवद...