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कौन सर्वश्रेष्ठ है भक्ति या भगवान्

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                                                                                                         (परमार्थ के पत्र पुष्प )                                                                                                        भगवद्भक्ति सच्चा स्मरण उसे कहते हैं कि जब अपने नेत्र , त्वचा , मन , बुद्धि आदि के विषय केवल अपने इष्ट देव  ही हो। नेत्र से यदि स्वान दिखाई  पड़ा तो हमने उसे नीच समझकर उसको मारा , तिरस्कृत  किया तो हमारा स्मरण खंडित हो गया...

विचारों को पवित्र कैसे बनाएं

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                    विचारो को पवित्र बनाने के उपाय बिना विचारे जो करे , सो पाछे पछिताय।  काम बिगारै आपनो  , जग में होय हंसाय।।                                  -गिरिधर कविराय  किसी भी कार्य को करने से पहले उसके परिणाम को भलीभांति सोच ले।यह अच्छी तरह विचार कर ले  कि आपने जो उपाय सोचे हैं उसका परिणाम शुभ होगा कि  नहीं। बिना विचार किये ऐसा कोई कार्य न करे जिससे बाद में पछताना पड़े।  विचारो को पवित्र बनाने के लिए सबसे पहले आपकी संगति शुद्ध होनी चाहिए , क्योंकि हमारी संगत या हमारा संग पवित्र व् सात्विक , धार्मिक विचारो वाला होगा तभी हमारा व्यवहार भी वैसा ही बन जायेगा और हमारे विचार भी पवित्र ही हो जायेंगे।  हमारे विचार हमारे खान -पान पर भी निर्भर करते हैं ,संत हमेशा इसी बात पर जोर देते हैं कि आप जब भी भोजन करे , अपने प्रभु को अर्पित करके ही ग्रहण करे। जब आप प्रसादरूपी भोजन को ग्रहण करेंगे तो आप क...

aaj ka shubh vichar

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                                                                                                 आज का शुभ विचार                    व्यर्थ कर्म भारीपन व थकान लाते  हैं जबकि श्रेष्ठ कर्म हमे प्रसन्न व हल्का बनाकर ताजगी प्रदान करते हैं।  इसलिए हमेशा श्रेष्ठ कर्म करने चाहिए ताकि हम प्रसन्न रहें।            

प्रभु का स्वभाव कैसा होता है?

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                                                                                                             प्रभु का स्वभाव भगवान श्री राम का कथन हैं कि कोई भी मुझसे मित्रता के लिए हाथ बढ़ाये तो मैं इंकार नहीं कर सकता हूँ , फिर चाहे  उसमे दोष ही क्यों न हो। मैं जब जीवों को अपनाता हूँ , जीव जब पूर्ण रूप से आत्मसमर्पण कर  देता हैं तब वह निर्दोष हो जाता हैं। शरणागत को प्रभु के सन्मुख रहना चाहिए। हर समय प्रभु के श्री  मुख को भक्त देखा करता हैं और प्रभु भक्त को देखते रहते हैं। इस प्रकार के भक्त को सन्मुख कहते हैं। सन्मुख भक्त के सभी पाप -ताप नष्ट हो जाते हैं। विमुख प्राणी ईश्वर से पीठ करके रहता हैं , तो प्रभु भी उससे पीठ कर लेते हैं।                 भक्तो के...

वेद शास्त्रों की विस्तृत जानकारियाँ

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वेद शास्त्रो की विस्त्तृत जानकारी                                            प्र.1- वेद किसे कहते है ? उत्तर- ईश्वरीय ज्ञान की पुस्तक को वेद कहते है। प्र.2- वेद-ज्ञान किसने दिया ? उत्तर- ईश्वर ने दिया। प्र.3- ईश्वर ने वेद-ज्ञान कब दिया ? उत्तर- ईश्वर ने सृष्टि के आरंभ में वेद-ज्ञान दिया। प्र.4- ईश्वर ने वेद ज्ञान क्यों दिया ? उत्तर- मनुष्य-मात्र के कल्याण के लिए। प्र.5- वेद कितने है ? उत्तर- चार प्रकार के । 1-ऋग्वेद 2 - यजुर्वेद 3- सामवेद 4 - अथर्ववेद प्र.6- वेदों के ब्राह्मण । वेद ब्राह्मण 1 - ऋग्वेद - ऐतरेय 2 - यजुर्वेद - शतपथ 3 - सामवेद - तांड्य 4 - अथर्ववेद - गोपथ प्र.7- वेदों के उपवेद कितने है। उत्तर - वेदों के चार उप वेद है । वेद उपवेद 1- ऋग्वेद - आयुर्वेद 2- यजुर्वेद - धनुर्वेद 3 -सामवेद - गंधर्ववेद 4- अथर्ववेद - अर्थवेद प्र 8- वेदों के अंग हैं कितने होते है । उत्तर - वेदों के छः अंग होते है । 1 -...

भजन- गोवर्धन वासी सांवरे तुम बिन रहा न जाए-------

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श्री कृष्ण प्रेमियों के लिए बहुत ही काम की बात:-) तुम्हारे इस पद का कम से कम एक वर्ष तक भाव से नित्य पाठ व गायन करने वाले को मेरे दर्शन अवश्य होंगे ही :- हमारे प्यारे श्री कृष्ण का अष्ट छाप के कवियों मे चर्तुभुज दास जी को ये वचन दिया है ऐसा नाभा जी ने इनकी जीवनी मे लिखा है क्यों न लाभ लिया जाय !   "जय श्री राधे" गोवर्धनवासी सांवरे तुम बिन रह्यो न जाये । — हे गोवर्धनवासी श्री कृष्ण, अब मैं आपके बिना नही रह सकता बंकचिते मुसकाय के सुंदर वदन दिखाय । लोचन तलफें मीन ज्यों पलछिन कल्प विहाय ॥१॥ — आपकी इस सुन्दर छवि ने मेरा मन मोह लिया है औ र आपकी मुस्कान में मेरा चित्त अटक गया है । जैसे मछली बिना पानी के तडपती है वैसे ही मेरी आँखौ को आपसे बिछडने की तडपन हो रही है र मेरा एक एक पल कल्प के समान बीत रहा है । सप्तक स्वर बंधान सों मोहन वेणु बजाय । सुरत सुहाई बांधि के मधुरे मधुर गाय ॥२॥ — हे मोहन आपकी वंशी की धुन सेकडौ संगीत स्वरौ से अोतप्रोत मधुर गीत गा रही है। रसिक रसीली बोलनी गिरि चढ गाय बुलाय । गाय बुलाई धूमरी ऊंची टेर सुनाय ॥३॥ — आप जब पर्वत पर चढकर गायौं को ...

पवित्र जीवन जीने के साधन कौन-कौन से हैं

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                                                                                                        पवित्र जीवन का जीने की कला विचारो की पवित्रता -                               मालिक तेरी रजा रहे और तू ही तू रहे                                बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे।                         जब तक कि तन में जान रंगों में लहू रहे ,                         तेरा  ही जिक्र हो और तेरी जुस्तजू रहे।। हमारा कर्तव्य है कि हम प्रत्येक कार्य ...