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शिव मानस पूजा हिंदी में भावार्थ

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                      शिव मानस पूजा हिंदी में भावार्थ आदि गुरु  शंकराचार्य द्वारा रचित शिव मानस पूजा शिव की एक अनूठी स्तुति है। इस स्तुति में मात्र कल्पना से शिव को सामग्री अर्पित की गई है और पुराण कहते हैं कि साक्षात शिव ने इस पूजा को स्वीकार किया था।  यह स्तुति भगवान भोलेनाथ की महान उदारता को प्रस्तुत करती है। इस स्तुति को पढ़ते हुए भक्तों द्वारा शिवशंकर को श्रद्धापूर्वक मानसिक रूप से समस्त पंचामृत दिव्य सामग्री समर्पित की जाती है।  हम कल्पना में ही उन्हें रत्नजडित सिहांसन पर आसीन करते हैं, दिव्य वस्त्र, भोजन तथा आभूषण आदि अर्पण करते हैं। हिन्दी अनुवाद सहित शिव मानस पूजा   रत्नैः कल्पितमानसं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं। नाना रत्न विभूषितम्‌ मृग मदामोदांकितम्‌ चंदनम॥ जाती चम्पक बिल्वपत्र रचितं पुष्पं च धूपं तथा। दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितम्‌ गृह्यताम्‌॥1 ॥ भावार्थ --- मैं अपने मन में ऐसी भावना करता हूँ कि हे पशुपति देव! संपूर्ण रत्नों से निर्मित इस सिंहासन पर आप विराजमान होइये। हिमालय के शीतल जल से...

एक विवाह की अनोखी शर्त

                एक विवाह की अनोखी शर्त एक राजा की लड़की की शादी होनी थी, लड़की की शर्त ये थी कि जो भी 20 तक कि गिनती सुनाएगा उसको राजकुमारी अपना पति चुनेगी,गिनती ऐसी हो जिसमें सारा संसार समा जाए, यदि नहीं सुना सकेगा तो उसको 20 कोड़े खाने पड़ेंगे और ये शर्त केवल राजाओं के लिए ही है। अब एक तरफ - राजकुमारी का वरण और दूसरी तरफ कोड़े!एक-एक करके राजा महाराजा आए राजा ने दावत भी रखी। मिठाई और सब पकवान तैयार कराए गए।पहले सब दावत का मजा ले रहे होते हैं,फिर सभा में राजकुमारी का स्वयंवर शुरू होता है! -एक से बढ़ कर एक राजा महाराजा आते हैं!सभी गिनती सुनाते हैं जो उन्होंने पढ़ी हुई थी,लेकिन कोई भी वह गिनती नहीं सुना सका जिससे राजकुमारी संतुष्ट हो सके!अब जो भी आता कोड़े खा कर चला जाता,कुछ राजा तो आगे ही नहीं आए उनका कहना था!कि गिनती तो गिनती होती है राजकुमारी पागल हो गई है,ये केवल हम सबको पिटवा कर मजे लूट रही है! ये सब नजारा देख कर एक हलवाई हंसने लगता है!वह कहता है अरे डूब मरो राजाओं, आप सबको 20 तक गिनती नहीं आती! -ये सब सुनकर सब राजा उसको दण्ड देने के लिए बोलते ...

।। राम जी का सहारा ||

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                          ।। राम जी का सहारा |    कथा उस समय की है, जब लंका पर चढ़ाई करने के लिए पूरी वानर सेना सेतु निर्माण के कार्य में लगी थी| सभी वानर दूर-दूर से शिलाएँ लेकर आ रहे थे। नल-नील को मिला श्राप वरदान साबित हो रहा था।  वे प्रभु श्रीराम का नाम ले-लेकर सभी शिलाओं को सागर में ड़ाल रहे थे। प्रभु श्रीराम के नाम के प्रताप से ड़ाली गयी सभी शिलायें सागर जल में डूबने की ज़गह तैर रही थीं। शीध्रता से सेतु निर्माण का कार्य चल रहा था।  लक्ष्मण, विभीषण तथा सुग्रीव जहा सेतु निर्माण कार्य का निरीक्षण कर रहे थे, वही श्री रामचन्द्र जी भी समीप ही एक शिला पर बैठे इस कार्य को देख रहे थे। उनके मन में विचार आया कि सभी सेतु निर्माण में व्यस्त हैं किन्तु मैं यहाँ खाली बैठ कर देखता रहूँ, यह तो उचित नहीं है।  वे चुपके से उठे और सबसे नजरें बचा कर एक शिला को उठाकर उन्होंने भी सागर जल में छोड़ दिया।  किन्तु यह क्या, जहाँ सभी शिलायें सागर जल में तैर रही थी, प्रभु श्रीराम द्वारा छोड़ी गई शिला तुरन्त जल में डूब गई।...

भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम बनाने के लिए माता कैकयी का त्याग

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  भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम बनाने के लिए  माता कैकयी का त्याग  एक रात जब माता कैकेयी सोती हैं, तो उनके स्वप्न में विप्र, धेनु, सुर, संत सब एक साथ हाथ जोड़ के आते हैं और उनसे कहते हैं कि 'हे माता कैकेयी, हम सब आपकी शरण में हैं, महाराजा दशरथ की बुद्धि जड़ हो गयी है तभी वो राम को राजा का पद दे रहे हैं, अगर प्रभु राजगद्दी पर बैठ गए तब उनके अवतार लेने का मूल कारण ही नष्ट हो जायेगा।  माता, सम्पूर्ण पृथ्वी पर सिर्फ आपमें ही ये साहस है की आप राम से जुड़े अपयश का विष पी सकती हैं, कृपया प्रभु को जंगल भेज के सुलभ करिये, युगों-युगों से कई लोग उद्धार होने की प्रतीक्षा में हैं, त्रिलोक स्वामी का उद्देश्य भूलोक का राजा बनना नहीं है अगर वनवास ना हुआ तो राम इस लोक के 'प्रभु' ना हो पाएंगे माता' ये कहते-कहते देवता घुटनों पर आ गए, माता कैकेयी के आँखों से आँसू बहने लगे।  माता बोलीं-'आने वाले युगों में लोग कहेंगे कि मैंने भरत के लिए राम को छोड़ दिया लेकिन असल में मैं राम के लिए आज भरत का त्याग कर रही हूँ, मुझे मालूम है, इस निर्णय के बाद भरत मुझे कभी स्वीकार नहीं करेगा।'  रामचर...

पैर और चरण में क्या अंतर है?

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                    पैर और चरण में क्या अंतर है :- रावण भगवान का शिव का बहुत बड़ा भक्त था, हम तो यदि भगवान शिव के ऊपर एक लोटा दूध भी चढाते है,तो वो भी पानी मिला होता है। रावण ने तो १० शीश चढा दिए,हम तो ठीक-ठीक प्रकार वेद का पाठ भी नहीं कर सकते,एक वेद को पढ़ने के लिए १२ वर्ष लगते है,यदि उम्र भी बीत जाए तब भी हम चारो वेद को ठीक प्रकार से नहीं पढ़ सकते,रावण चारो वेदों का ज्ञाता था और वेदों पर भाष्य रावण ने लिखा. नवग्रह से लेकर समस्त देवी-देवता उसके यहाँ नौकरी करते थे,काल रावण के वश में था.ब्रह्मा जी स्वयं उसके आँगन में आकर पाठ करते थे,स्वर्ग लोक से लेकर कैलाश तक रावण की पहुँच थी.इतना सब कुछ होने पर भी रावण की कोई पूजा नहीं करता.कोई अपने बेटे का नाम रावण नहीं रखता.क्यों ? उसका एक ही कारण था.सब कुछ होने पर भी रावण "आचरणहीन" था.जिसके जीवन में आचरण की शुद्धता नहीं वह चाहे कितना भी ऊँचा क्यों न हो,उसका जीवन शून्य है,जीवन में आचरण की शुद्धता बहुत जरुरी है.चरण उनके पूजनीय हो सकते है जिसका आचरण अच्छा हो. पैर और चरण में बहुत बड़ा अंतर है. हम सभी के ...

क्रोध और अहंकार मिटाता है। "प्रणाम"

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                     क्रोध और अहंकार मिटाता है। "प्रणाम"  प्रणाम में बड़ी ताकत होती है।पहले लोग सुबह सुबह उठ कर घर के बड़े-बुजुर्गों को झुक कर प्रणाम करते थे, उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करते थे, विशेषकर महिलाएं। लेकिन आजकल यह प्रथा धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है और हम बुजुर्गों के आशीर्वादों से वंचित। वर्तमान में हमारे घरों में जो इतनी समस्याएं हैं उनका मूल कारण यही है कि हम घर के बड़े-बुजुर्गों का आदर नहीं करते और जाने-अनजाने अक्सर घर के बड़ों की उपेक्षा हो जाती है।यदि घर के बच्चे और बहुएं प्रतिदिन घर के सभी बड़ों को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लें तो, शायद किसी भी घर-परिवार में कभी कोई क्लेश ही न हो। दरअसल बड़ों के दिए हुए आशीर्वाद हमारे लिए कवच की तरह काम करते हैं और उनको दुनिया का कोई भी अस्त्र-शस्त्र नहीं भेद सकता। एक दिन महाभारत युद्ध के दौरान दुर्योधन के व्यंग्य से आहत होकर भीष्म पितामह घोषणा करते हैं कि वे कल पाण्डवों का वध कर देंगे।उनकी इस घोषणा का पता चलते ही पाण्डवों के शिविर में खलबली और बेचैनी बढ़ गई क्योंकि भीष्म...

हनुमान चालीसा में छिपे मैनेजमेंट के सूत्र...

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               हनुमान चालीसा में छिपे मैनेजमेंट के सूत्र... कई लोगों की दिनचर्या हनुमान चालीसा पढ़ने से शुरू होती है। पर क्या आप जानते हैं कि श्री *हनुमान चालीसा* में 40 चौपाइयां हैं, ये उस क्रम में लिखी गई हैं जो एक आम आदमी की जिंदगी का क्रम होता है। माना जाता है तुलसीदास ने चालीसा की रचना मानस से पूर्व किया था। हनुमान को गुरु बनाकर उन्होंने राम को पाने की शुरुआत की। अगर आप सिर्फ हनुमान चालीसा पढ़ रहे हैं तो यह आपको भीतरी शक्ति तो दे रही है लेकिन अगर आप इसके अर्थ में छिपे जिंदगी के सूत्र समझ लें तो आपको जीवन के हर क्षेत्र में सफलता दिला सकते हैं। हनुमान चालीसा सनातन परंपरा में लिखी गई पहली चालीसा है शेष सभी चालीसाएं इसके बाद ही लिखी गई। हनुमान चालीसा की शुरुआत से अंत तक सफलता के कई सूत्र हैं। आइए जानते हैं हनुमान चालीसा से आप अपने जीवन में क्या-क्या बदलाव ला सकते हैं…. शुरुआत गुरु से… हनुमान चालीसा की शुरुआत गुरु से हुई है… श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि। अर्थ - अपने गुरु के चरणों की धूल से अपने मन के दर्पण को साफ करता हूं। गुरु का ...