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हमारा सफर - श्री राम से श्री कृष्ण और कलयुग में

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  हमारा सफर - श्री राम से श्री कृष्ण और कलयुग में भी जारी श्री राम का घर छोड़ना एक षड्यंत्रों में घिरे राजकुमार की करुण कथा है और कृष्ण का घर छोड़ना गूढ़ कूटनीति। राम जो आदर्शों को निभाते हुए कष्ट सहते हैं, कृष्ण षड्यंत्रों के हाथ नहीं आते बल्कि स्थापित आदर्शों को चुनौती देते हुए एक नई परिपाटी को जन्म देते हैं। श्री राम से श्री कृष्ण हो जाना एक सतत प्रक्रिया है। श्रीराम को मारीच भ्रमित कर सकता है लेकिन कृष्ण को पूतना की ममता भी नहीं उलझा सकती। श्रीराम अपने भाई को मूर्छित देखकर ही बेसुध बिलख पड़ते हैं लेकिन कृष्ण अभिमन्यु को दांव पर लगाने से भी नहीं हिचकते। राम राजा हैं कृष्ण राजनीति राम रण हैं कृष्ण रणनीति। श्री राम मानवीय मूल्यों के लिए लड़ते हैं श्री कृष्ण मानवता के लिए।  श्री राम धर्म है तो श्री कृष्ण धर्म स्थापना  हर मनुष्य की यात्रा राम से ही शुरू होती है और "समय" उसे कृष्ण बनाता है। व्यक्ति का कृष्ण होना भी उतना ही जरूरी है जितना राम होना लेकिन राम से प्रारंभ हुई यह यात्रा तब तक अधूरी है जब तक इस यात्रा का समापन कृष्ण पर न हो.!! ।।जय राम कृष्ण हरे।।

राम नाम की शक्ति क्या होती हैं

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                     राम नाम की शक्ति क्या होती हैं जब प्रभु राम जी को समुद्र देवता ने बतलाया, कि हे भगवन् आपकी ही सेना में नल और नील नाम का दो बानर है जो पुल निर्माण करने में अति कुशल है।आप उन दोंनों की सहायता से सेतु का निर्माण कराकर लंका तक आसानी से पहुँच जायेंगें। तब राम जी ने दोनों को बुलाकर सेतु निर्माण का आदेश दिया और सभी बानर पत्थर उठा उठकर लाने लगे। ,हनुमान जी उन पत्थरों पर राम राम लिखते जाते और नल तथा नील उसे ले जाकर समुद्र में गिराते जाते। इस प्रकार जो भी पत्थर समुद्र में गया सभी के सभी एक दुसरे से जुड़कर उपलाते हुए सेतु के रूप में बँधते रहे।सेतु निर्माण कार्य बहुत द्रुत गति से सुचारू रूप से चल रहा था।प्रभु राम को शाम की वेला में सेतु बंधन कार्य की प्रगति के बारे में बता दिया गया।हनुमान ने बताया कि भगवन ,सभी पत्थरें आपका नाम लिखकर समुद्र में डालने पर वे सभी आपस में जुड़कर सेतु के रूप में हो जा रहे हैं। इस प्रकार सेतु निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है। परन्तु ज्यों ज्यों रात होती गयी प्रभु राम जी की बैचेनी बढ़ती गयी।उन्हें आ...

श्रीमद् भागवत गीता का 13 अध्याय का सरल अर्थ

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    श्रीमद् भागवत गीता का 13 अध्याय का सरल अर्थ संसार में एक परमात्मा तत्व ही जानने योग्य है। उसको जरूर जान लेना चाहिए। उसको तत्व से जानने पर जानने वाले की परमात्मा तत्व के साथ अभिन्नता हो जाती है।  जिस परमात्मा को जानने से अमरता की प्राप्ति हो जाती है ,उसे परमात्मा के हाथ, पैर,सिर, नेत्र , कान सब जगह है।वह संपूर्ण इंद्रियों से रहित होने पर भी संपूर्ण विषयों को प्रकाशित करता है, संपूर्ण गुणों से रहित होने पर भी संपूर्ण गुणों का भोक्ता है और आसक्ति रहित होने पर भी  सबका पालन पोषण करता है। वह संपूर्ण प्राणियों के बाहर भी है और भीतर भी है, तथा चर अचर प्राणियों के रूप में भी वही है, संपूर्ण प्राणियों में विभक्त रहता हुआ भी वह विभाग रहित है। वह संपूर्ण ज्ञानो का प्रकाशक है वह संपूर्ण विषम प्राणियों में सम रहता है। गतिशील प्राणियों में गति रहित रहता है। नष्ट होते हुए  प्राणियों में अविनाशी रहता है। इस तरह परमात्मा का यथार्थ जान लेने पर परमात्मा को प्राप्त हो जाता है।

सूर्य को हनुमान जी कैसे निगल गये?

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            सूर्य को हनुमान जी कैसे निगल गये? पृथ्वी से 28 लाख गुना सूर्य हनुमान जी ने कैसे निगल लिया? क्या यह विज्ञान के साथ मजाक है ? इस हिसाब से तो आपको हर उस चीज पर सवाल उठाने चाहिए जो की आसान नहीं है। जैसे कि हनुमान जी ने बिन थके इतना विशाल समुद्र कैसे पार कर लिया। अरे श्री हनुमान जी भगवान का अंश है उन्हे विभिन्न तरीके के वरदान प्राप्त हुए है। भगवान है। हनुमान जी के पास अष्ट महासिद्धि और नौ निधि हैं. ये अष्ट महासिद्धि अणिमा, लघिमा, महिमा, ईशित्व, प्राक्रम्य, गरिमा और वहित्व हैं। इन्ही सिद्धि के सहारे उनका सूर्य के पास जाना और उसे निगलना संभव हैं लेकिन हनुमान जी निगलते नहीं है। गोस्वामी तुलसीदास द्वारा लिखी हनुमान चालीसा के इस 18वीं चौपाई में सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी का वर्णन है। जुग सहस्त्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।। यह दोहा अवधी भाषा में है इस दोहे का हिंदी भाषा में अर्थ है कि हनुमानजी ने एक युग सहस्त्र योजन की दूरी पर स्थित भानु यानी सूर्य को मीठा फल समझकर खा लिया था (खाने ही वाले थे तभी देवराज इंद्र ने प्रहार कर दिया)। अगर आप यहा...

कर्मो के हिसाब

                                कर्मो के हिसाब  एक भिखारी रोज एक दरवाजें पर जाता और भीख के लिए आवाज लगाता, और जब घर मालिक बाहर आता तो उसे गंदी गंदी गालिया और ताने देता, मर जाओ, काम क्यूं नही करतें, जीवन भर भीख मांगतें रहोगे, कभी कभी गुस्सें में उसे धकेल भी देता, पर भिखारी बस इतना ही कहता, ईश्वर तुम्हारें पापों को क्षमा करें। एक दिन सेठ बड़े गुस्सें में था, शायद व्यापार में घाटा हुआ था, वो भिखारी उसी वक्त भीख मांगने आ गया, सेठ ने आव देखा ना ताव, सीधा उसे पत्थर से दे मारा, भिखारी के सर से खून बहने लगा, फिर भी उसने सेठ से कहा ईश्वर तुम्हारें पापों को क्षमा करें, और वहां से जाने लगा, सेठ का थोड़ा गुस्सा कम हुआ, तो वहां सोचने लगा मैंने उसे पत्थर से भी मारा पर उसने बस दुआ दी, इसके पीछे क्या रहस्य है जानना पड़ेगा, और वहां भिखारी के पीछे चलने लगा, भिखारी जहाँ भी जाता सेठ उसके पीछे जाता, कही कोई उस भिखारी को कोई भीख दे देता तो कोई उसे मारता, जलील करता गालियाँ देता, पर भिखारी इतना ही कहता, ईश्वर तुम्हारे पापों को...

शिव जी की आधी परिकर्मा क्यों की जाती है ?

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          शिव जी की आधी परिकर्मा क्यों की जाती है ? शिव जी की आधी परिक्रमा करने का विधान है, वह इसलिए की शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता है। जब व्यक्ति आधी परिक्रमा करता है, तो उसे चंद्राकार परिक्रमा कहते हैं। शिवलिंग को ज्योति माना गया है और उसके आसपास के क्षेत्र को चंद्र। आपने आसमान में अर्ध चंद्र के ऊपर एक शुक्र तारा देखा होगा। यह शिवलिंग उसका ही प्रतीक नहीं है बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड ज्योतिर्लिंग के ही समान है। '' अर्द्ध सोमसूत्रांतमित्यर्थ: शिव प्रदक्षिणीकुर्वन सोमसूत्र न लंघयेत।। इति वाचनान्तरात।'' सोमसूत्र : शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र की कहा जाता है, शास्त्र का आदेश है कि शंकर भगवान की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है। सोमसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है,वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है। क्यों नहीं लांघते सोमसूत्र : सोमसूत्र में शक्ति-स्रोत होता है अत: उसे लांघते समय पैर फैलाते हैं और वीर्य ‍निर्मित और 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे दे...

जब रामजी वनवास जाने लगे तो लक्ष्मण जी की क्या स्थिति थी?

 जब रामजी  वनवास जाने लगे तो लक्ष्मण जी की क्या स्थिति थी? राम-लक्ष्मण संवाद  समाचार जब लछिमन पाए। ब्याकुल बिलख बदन उठि धाए ॥जब लक्ष्मणजी ने समाचार पाए, तब वे व्याकुल होकर उदास मुँह उठ दौड़े। भगवान के चरणों में गिर गए हैं। और सोच रहे हैं मुझको श्री रघुनाथजी क्या कहेंगे? घर पर रखेंगे या साथ ले चलेंगे? और लक्ष्मण हाथ जोड़ कर कहते हैं की भगवान मेरे लिए क्या आज्ञा है? भगवान श्री राम ने देखा की लक्ष्मण हाथ जोड़े खड़े हुए है और समझ गए हैं की ये भी साथ चलना चाहते हैं। श्री रामचन्द्रजी वचन बोले- तुम प्रेमवश अधीर मत होओ। मेरी सीख सुनो और माता-पिता के चरणों की सेवा करो। भरत और शत्रुघ्न घर पर नहीं हैं, और तुम यहाँ पर राज काज सम्भालो। यदि मैं तुमको साथ लेकर जाऊंगा तो अयोध्या अनाथ हों जाएगी। गुरु, पिता, माता, प्रजा और परिवार सभी पर दुःख का दुःसह भार आ पड़ेगा॥ प्रेमवश लक्ष्मणजी से कुछ उत्तर देते नहीं बनता। उन्होंने व्याकुल होकर श्री रामजी के चरण पकड़ लिए और कहा- हे नाथ! मैं दास हूँ और आप स्वामी हैं, अतः आप मुझे छोड़ ही दें तो मेरा क्या वश है? आपने मुझे सीख तो बड़ी अच्छी दी है, पर मैं तो एक प्र...