ramraksha stotra

                   राम रक्षा स्तोत्र

       राम रक्षा स्तोत्र (हिंदी में अर्थ सहित)


यह रहा राम रक्षा स्तोत्र का हिंदी में अर्थ — श्लोक के बाद सरल हिंदी अनुवाद दिया गया है:

राम रक्षा स्तोत्र (हिंदी में अर्थ सहित)

1.
ॐ श्रीरामं रमणं मेणि रामं रम्यं भजे सदा।
रामेणाभिहितं स्तोत्रं रामरक्षा शुभप्रदम्॥

अर्थ:
मैं सुंदर, मनोहर भगवान श्रीराम का सदा भजन करता हूँ। भगवान राम द्वारा कहा गया यह राम रक्षा स्तोत्र शुभफल देने वाला है।

2.
ध्यानम् –
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं
पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्।
वामाङ्कारूढसीता मुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं
नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलं रामचन्द्रम्॥

अर्थ:
भगवान राम को ध्यान कीजिए जिनकी भुजाएं घुटनों तक हैं, जो धनुष-बाण धारण किए हैं, पद्मासन में विराजमान हैं, पीत वस्त्र पहने हैं, जिनकी आँखें कमल के समान हैं, जो प्रसन्न हैं, जिनके बाएँ भाग में माता सीता विराजमान हैं, जिनका रंग नीले मेघ के समान है, जिनका शरीर अनेक आभूषणों से शोभायमान है और सिर पर जटाजूट है।

3.
चरितं रघुनाथस्य शतकोटि प्रविस्तरम्।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्॥

अर्थ:
श्रीराम का चरित्र करोड़ों कथाओं में विस्तारित है, और उसका एक-एक अक्षर ही महान पापों का नाश करने वाला है।

4.
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्।
जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम्॥

अर्थ:
नीलकमल के समान श्यामवर्ण, कमल जैसी आँखों वाले, सीता और लक्ष्मण से युक्त, जटाओं से सुशोभित श्रीराम का ध्यान करें।

5.
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम्।
स्वलीलया जगत्त्रातुं आविर्भूतं अजं विभुम्॥

अर्थ:
जो हाथ में धनुष-बाण, तरकस धारण करते हैं, राक्षसों का नाश करते हैं, लीला से जगत का पालन करते हैं, वे अजन्मा और सर्वशक्तिमान भगवान श्रीराम प्रकट हुए हैं।

6.
रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम्।
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः॥

अर्थ:
बुद्धिमान व्यक्ति को यह राम रक्षा स्तोत्र पढ़ना चाहिए, जो पापों को नाश करने वाला और सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। श्री राघव मेरे सिर की, दशरथ पुत्र मेरे ललाट की रक्षा करें।

7.
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः॥

अर्थ:
कौसल्या पुत्र मेरी आँखों की, विश्वामित्र प्रिय मेरी श्रवण शक्ति की, यज्ञ की रक्षा करने वाले मेरी नाक की, और लक्ष्मण को स्नेह देने वाले मेरे मुख की रक्षा करें।

8.
जिव्हां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः।
स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः॥

अर्थ:
विद्या के भंडार मेरी जीभ की, भरत द्वारा पूज्य मेरे कंठ की, दिव्य शस्त्रधारी मेरे कंधों की, और शिव का धनुष तोड़ने वाले मेरी भुजाओं की रक्षा करें।

9.
करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित्।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः॥

अर्थ:
सीता पति मेरे हाथों की, परशुराम को पराजित करने वाले मेरे हृदय की, खर को मारने वाले मेरे पेट की, और जाम्बवान के सहारे रहने वाले मेरी नाभि की रक्षा करें।

10.
सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः।
ऊरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत्॥

अर्थ:
सुग्रीव के स्वामी मेरी कमर की, हनुमान के स्वामी मेरी जांघों की, और राक्षसों का नाश करने वाले रघुकुलश्रेष्ठ मेरी ऊरुओं की रक्षा करें।

11.
जानुनी सेतुकृद्पातु जङ्घे दशमुखान्तकः।
पादौ बिभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः॥

अर्थ:
सेतु बनाने वाले श्रीराम मेरी घुटनों की, रावण का वध करने वाले मेरी पिंडलियों की, विभीषण को राज्य देने वाले मेरे चरणों की, और श्रीराम सम्पूर्ण शरीर की रक्षा करें।

12.
एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्॥

अर्थ:
जो पुण्यात्मा यह राम रक्षा स्तोत्र पढ़ता है, वह दीर्घायु, सुखी, संतानवान, विजयी और विनम्र होता है।

13.
पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः।
न द्रष्टुं अपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः॥

अर्थ:
पाताल, पृथ्वी या आकाश में विचरण करने वाले छिपे हुए शत्रु भी राम नाम से रक्षित व्यक्ति को देख तक नहीं सकते।

14.
रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन्।
नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति॥

अर्थ:
जो व्यक्ति 'राम', 'रामभद्र', 'रामचन्द्र' नाम का जप करता है, वह पापों से लिप्त नहीं होता, और उसे भौतिक सुख तथा मोक्ष दोनों प्राप्त होते हैं।

15.
जगज्जत्रं महेशानं कोटिसूर्यसमप्रभम्।
एकबाणेन संहर्तुं सदा रामं नमाम्यहम्॥

अर्थ:
जो भगवान महेश के समान हैं, जो करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी हैं, एक बाण से ही जगत का संहार करने में समर्थ हैं, ऐसे श्रीराम को मैं नमन करता हूँ।

16.
रामाज्ञया चतुर्युगं तपो ज्ञानं च धारयन्।
रामरक्षा कृता तेन धर्मात्मना महात्मना॥

अर्थ:
श्रीराम की आज्ञा से तपस्वी और ज्ञानी उस धर्मात्मा महात्मा ने यह रामरक्षा स्तोत्र की रचना की।

अंत में प्रसिद्ध श्लोक:
श्रीरामराम रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने॥

अर्थ:
हे सुंदर मुखवाली पार्वती! "राम" नाम का उच्चारण "रामरामराम" कहने से हजार नामों के बराबर फल मिलता है।

।।जय सियाराम।।


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