श्री हरि का नाम सुनते ही या कन्हैया का नाम सुनते ही उससे मिलने की, उसको पाने की तड़प होने लगे उसी का नाम प्रेम है।
प्रेम के दो रुप हैं; एक प्यास और एक तृप्ति श्री हरि का नाम सुनते ही या कन्हैया का नाम सुनते ही उससे मिलने की, उसको पाने की तड़प होने लगे उसी का नाम प्रेम है। नन्दनन्दन, श्यामसुन्दर, मुरलीमनोहर,पीताम्बरधारी– जिनके मुखारविन्द पर मन्द-मन्द मुस्कान है। सिर पर मयूर-पिच्छ का मुकुट, गले में पीताम्बर, ठुमुक-ठुमुककर चलने वाला, बाँसुरी बजाने वाला जो मनमोहन प्राणप्यारा है, उसको प्राप्त करने की इच्छा, उत्कंठा, व्याकुलता, तड़प जब अपने ह्रदय को दग्ध करने लगे, तब समझो कि प्यास जगी और जब उसकी बात सुनकर, उसकी याद आने से, उसके लिये कोई कार्य करने से अपने ह्रदय में रस का प्राकट्य हो, अनुभव हो तब इसे तृप्ति कहते हैं। श्रीहरि को ढूँढ़ने के लिये निकले और पानी में उतरे ही नहीं, किनारे पर ही बैठे रहे, इसका नाम प्यास नहीं है और जब प्यास ही नहीं तो तृप्ति कैसी? कहीं हम स्वयं को ही तो मृग-मरीचिका के भ्रम में नहीं डाल रहे ! श्री हरी से प्रेम तो है पर उनको पाने की साधना में आलस है या रुचि नहीं है। मेहनत नहीं करना चाहते हैं। आनन्द के लिये प्यास और आनन्द की प्राप्ति पर तृप्ति ! संयोग ...