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श्री हरि का नाम सुनते ही या कन्हैया का नाम सुनते ही उससे मिलने की, उसको पाने की तड़प होने लगे उसी का नाम प्रेम है।

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          प्रेम के दो रुप हैं; एक प्यास और एक तृप्ति श्री हरि का नाम सुनते ही या कन्हैया का नाम सुनते ही उससे मिलने की, उसको पाने की तड़प होने लगे उसी का नाम प्रेम है। नन्दनन्दन, श्यामसुन्दर, मुरलीमनोहर,पीताम्बरधारी– जिनके मुखारविन्द पर मन्द-मन्द मुस्कान है। सिर पर मयूर-पिच्छ का मुकुट, गले में पीताम्बर, ठुमुक-ठुमुककर चलने वाला, बाँसुरी बजाने वाला जो मनमोहन प्राणप्यारा है, उसको प्राप्त करने की इच्छा, उत्कंठा, व्याकुलता, तड़प जब अपने ह्रदय को दग्ध करने लगे, तब समझो कि प्यास जगी और जब उसकी बात सुनकर, उसकी याद आने से, उसके लिये कोई कार्य करने से अपने ह्रदय में रस का प्राकट्य हो, अनुभव हो तब इसे तृप्ति कहते हैं। श्रीहरि को ढूँढ़ने के लिये निकले और पानी में उतरे ही नहीं, किनारे पर ही बैठे रहे, इसका नाम प्यास नहीं है और जब प्यास ही नहीं तो तृप्ति कैसी? कहीं हम स्वयं को ही तो मृग-मरीचिका के भ्रम में नहीं डाल रहे ! श्री हरी से प्रेम तो है पर उनको पाने की साधना में आलस है या रुचि नहीं है। मेहनत नहीं करना चाहते हैं। आनन्द के लिये प्यास और आनन्द की प्राप्ति पर तृप्ति ! संयोग ...

जिस किसी से भी आपको कुछ भी सीखने को मिल जाए वह आपका गुरु

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                                 गुरु पूर्णिमा  भगवान वेदव्यास की जयंती गुरु पूर्णिमा है इस दिन व्यास, संत गुरु जन पूज्य है। नित्य ही पूजा होती है,पर गुरु पूर्णिमा की पूजा विशेष होनी चाहिए। इस अवसर पर गो,संत सेवा की जानी चाहिएं। गुरु तत्व से परे कोई तत्व नहीं है। नास्ति तत्वं गुरो: परम्  बताया गया है कि इश्वर तत्व ही गुरु तत्व है। विद्या, बुद्धि,आयु में श्रेष्ठ सभी गुरु हैं। जो लोग अपनी दीनता से सभी जीवो को अपने से श्रेष्ठ मानते हैं, उनके लिए गुरु तत्व सर्वव्यापक है। जिस से भी कुछ सीखने को मिल जाए वही गुरु हैं। प्रथम जिन्होंने मंत्र दीक्षा दी, फिर जिन्होंने उपदेश दिया। कर्म कर्म से सभी में गुरु भावना पुष्ट होती है।सभी जगह गुरु तत्व का बोध हो जाएगा। संसार की सभी प्राणी, वस्तुएं शिक्षाप्रद है। जो प्रभु से मिलन का मार्ग दिखलाए वही गुरु है। जिसके वचनों में श्रद्धा विश्वास है, वही गुरु है। झालीरानी को रैदास जी में गुरु तत्व दिखाई पड़ा, रानी रत्नावती ने अपनी दासी से शिक्षा ग्रहण की। अनुकूल आचरण से त...

समझो! कि हम किस कैटेगरी में आते हैं

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                                          समझो संसार में दो प्रकार के पेड़- पौधे होते हैं प्रथम : अपना फल स्वयं दे देते हैं, जैसे - आम, अमरुद, केला इत्यादि । द्वितीय : अपना फल छिपाकर रखते हैं, जैसे - आलू, अदरक, प्याज इत्यादि । जो फल अपने आप दे देते हैं, उन वृक्षों को सभी खाद-पानी देकर सुरक्षित रखते हैं, और  ऐसे वृक्ष फिर से फल देने के लिए तैयार हो जाते हैं । किन्तु जो अपना फल छिपाकर रखते है, वे जड़ सहित खोद लिए जाते हैं, उनका वजूद ही खत्म हो जाता हैं।* ठीक इसी प्रकार... जो व्यक्ति अपनी विद्या, धन, शक्ति स्वयं ही समाज सेवा में समाज के उत्थान में लगा देते हैं, उनका सभी ध्यान रखते हैं और वे मान-सम्मान पाते है। वही दूसरी ओर  जो अपनी विद्या, धन, शक्ति स्वार्थवश छिपाकर रखते हैं, किसी की सहायता से मुख मोड़े रखते है, वे जड़ सहित खोद लिए जाते है, अर्थात् समय रहते ही भुला दिये जाते है। प्रकृति कितना महत्वपूर्ण संदेश देती है, बस समझने, सोचने  की बात है। ।।जय श्री राधे।।

कागभुसुंडि जी कौन थे?

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कागभुसुंडि जी कौन है?  जब भोले बाबा मां गोरा को श्री रामचरितमानस की कथा सुना रहे थे तब अंत में गौरा मां ने प्रश्न किया कि मैं यह जानना चाहती हूं कि यह काग भुसुंडि जी कौन थे? जिनसे आपने कथा सुनी। हे कृपालु ! बताइए उसको इन्हीं प्रभु का यह पवित्र सुंदर चरित्र कहां पाया और हे कामदेव के शत्रु यह भी बताइए आपने इसे किस प्रकार सुना? मुझे बड़ा भारी कौतूहल हो रहा है।  तब महादेव ने प्रसंग सुनाया। महादेव बोले हे सुमुखी! है सुलोचना ! प्रसंग सुनो, पहले तुम्हारा अवतार दक्ष के घर में हुआ था, तब तुम्हारा नाम सती था। दक्ष के यज्ञ में तुम्हारा अपमान हुआ। तब तुम ने अत्यंत विरोध करके प्राण त्याग दिए और फिर मेरे से सेवकों ने यज्ञ विध्वंस कर दिया।यह सब तुम जानती हो। तब मेरे मन में बड़ा सोच हुआ और हे प्रिय! मैं तुम्हारी वियोग से दुखी हो गया,मैं विरक्त भाव से सुंदरवन पर्वत नदी और तालाबों का दृश्य देखता फिरता था। सुमेरु पर्वत की उत्तर दिशा में और भी दूर एक बहुत ही सुंदर नील पर्वत है। उसकी सुंदर स्वर्ण में शिखर है। उनमें से चार सुंदर शिखर मेरे मन को बहुत ही अच्छे लगे। उनमें से एक बरगद, पीपल, पाकर और आम ...

श्री राम जी के द्वारा भक्तों के जन्म मरण को मिटाने वाले वचन

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 श्री राम जी के द्वारा भक्तों के जन्म मरण को मिटाने वाले वचन एक बार श्री राम जी ने अयोध्या में अपने समस्त नगरवासियों को बुलाया और उनको अपने हृदय की बात सुनाई और सब को कहा कि आप मेरी बातों को सुन लो और यह जो तुम्हें अच्छी लगे तो उसके अनुसार ही करो। वही मेरा सेवक है और वही मेरा प्रियतम है, जो मेरी आज्ञा माने।  बड़े भाग्य से मनुष्य शरीर मिला है सब ग्रंथों में यही कहा है कि यह शरीर देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। कठिनाई से मिलता है। यह साधन का धाम और मोक्ष का दरवाजा है। इसे पा कर भी जिसने पढ़ लो ना बना लिया वह परलोक में दुख पाता है सिर पीट पीटकर पछताता है तथा अपने दोष ना समझ कर काल पर,कर्म पर और ईश्वर पर मिथ्या दोष लगाता है। हे भाई इस शरीर के प्राप्त होने का फल विषय भोग नहीं है, इस जगत के लोगों की तो बात ही क्या, स्वर्ग का भोग भी बहुत थोड़ा है और अंत में दुख देने वाला है। जो लोग मनुष्य शरीर पाकर विषय में मन लगा देते हैं। वह मूर्ख अमृत को बदलकर विष ले लेते हैं। जो पारस मणि को खोकर बदले में घुं धनघची ले लेता है। उसको कभी कोई  बुद्धिमान नहीं कहता। यह अविनाशी जीव चार खानों और 840000...

क्या आपको अपने सभी काम सफल करने हैं तो

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         क्या आपको अपने सभी काम सफल करने हैं? तो आदत डाल ले, जब भी कहीं जाए तो 4 बार नारायण, नारायण बोल कर ही निकले। आपके सब काम सफल होंगे और कुछ खराब होने भी होंगे, तो वह भी ठीक हो जाएंगे। खराब काम होने से बच जाएगा। आपका सत्संग सफल हो जाएगा। खराब काम से बचना और अच्छे काम में सफल होना, यह दोनों बातें ही नारायण– नारायण कहने से हो जाएंगे। भगवान का जो भी नाम प्रिय हो वह ले। अगर आप कोई भी काम प्रारंभ करने से पहले भगवान का नाम लेंगे और यही बातें अपने बच्चों को भी सिखा देंगे, तो हमारा बहुत बड़ा काम हो जाएगा। मैं अपने ऊपर आपकी बहुत बड़ी कृपा मानूंगा।  परम पूज्य श्रद्धेय श्री रामसुखदास जी के श्री मुख से।

श्री कृष्ण लीलामृत

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                                श्री कृष्ण लीलामृत,जब दरबान ने  लौट कर विधाता ब्रह्मा जी से पूछा की हे ब्रह्मा जी आप कौन से वाले ब्रह्मा जी है। भगवान ने पूछा है? जब भगवान श्री कृष्ण द्वारिका के राजा थे. उस समय की बात है। भगवान श्री कृष्ण  से मिलने अनेक देवता आया करते थे।        एक बार विधाता ब्रह्मा जी उनसे मिलने आए, और दरबान तुरंत ब्रह्मा जी के आगमन को भगवान श्री कृष्ण को सूचित किया। तब श्री भगवान ने दरबान, से पूछा क्या  तुम्हे पता है वो जो ब्रह्मा जी है वो कहा से आए है उनका परिचय क्या है ?दरबान लौट कर विधाता ब्रह्मा जी से पूछा की हे ब्रह्मा जी आप कौन से वाले ब्रह्मा जी है। भगवान ने पूछा है?  कौन से  ब्रह्मा ? विधाता ब्रह्मा आश्चर्यचकित थे। उन्होंने कहा कि दरबान तुम `कृपया भगवान श्रीकृष्ण को सूचित करो कि मैं चतुर्मुख ब्रह्मा ,संतकुमारो का पिता ब्रह्मा ,और श्री भगवान की ही आज्ञा से इस सृष्टि रचना करने वाला ब्रह्मा हूँ । दरबान तब ब्रह्मा जी के विवरण को श्री भगवान क...