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हमें भी मन से हार नहीं माननी चाहिए और निरंतर भगवान के नाम जप का अभ्यास करते रहना चाहिए।

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              सत्संग में रुचि से क्या फायदा होता है? एक शख्स सुबह सवेरे उठा साफ़ कपड़े पहने और सत्संग घर की तरफ चल दिया ताकि सत्संग का आनंद प्राप्त कर सके। चलते चलते रास्ते में ठोकर खाकर गिर पड़ा।कपड़े कीचड़ से सन गए वापस घर आया। कपड़े बदलकर वापस सत्संग की तरफ रवाना हुआ, फिर ठीक उसी जगह ठोकर खा कर गिर पड़ा और वापस घर आकर कपड़े बदले। फिर सत्संग की तरफ रवाना हो गया। जब तीसरी बार उस जगह पर पहुंचा तो क्या देखता है की एक शख्स चिराग हाथ में लिए खड़ा है और उसे अपने पीछे पीछे चलने को कह रहा है। इस तरह वो शख्स उसे सत्संग घर के दरवाज़े तक ले आया। पहले वाले शख्स ने उससे कहा आप भी अंदर आकर सतसंग सुन लें। लेकिन वो शख्स चिराग हाथ में थामे खड़ा रहा और सत्संग घर  में दाखिल नही हुआ। दो तीन बार इनकार करने पर उसने पूछा आप अंदर क्यों नही आ रहे है ...? दूसरे वाले शख्स ने जवाब दिया *"इसलिए क्योंकि मैं काल हूँ,  ये सुनकर पहले वाले शख्स की हैरत का ठिकाना न रहा।  काल  ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा मैं ही था जिसने आपको ज़मीन पर गिराया था। जब आपने घर जाकर कपड़े बदले और दु...

सूर्य देव के बारे में संपूर्ण जानकारी

                    सूर्य देव के बारे में संपूर्ण जानकारी  अक्सर मन में यह विचार आता है कि सूर्य ग्रह है या देवता? देवता है तो ग्रह कैसे हो सकता है?  आओ जानते हैं कि सूर्य देव कौन हैं और कैसे हैं? 1. सूर्य देव के माता पिता  पौराणिक सन्दर्भ में सूर्यदेव की उत्पत्ति के अनेक प्रसंग प्राप्त होते हैं। पुराणों अनुसार सूर्य देवता के पिता का नाम महर्षि कश्यप व माता का नाम अदिति है। अदिति के पुत्रों को आदित्य कहा गया है। 33 देवताओं में अदिति के 12 पुत्र शामिल हैं जिनके नाम इस प्रकार हैं- विवस्वान् (सूर्य), अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरुण, मित्र, इंद्र और त्रिविक्रम (भगवान वामन)। 12 आदित्यों के अलावा 8 वसु, 11 रुद्र और 2 अश्विनकुमार मिलाकर 33 देवताओं का एक वर्ग है। ब्रह्माजी के पुत्र मरिचि से कश्यप का जन्म हुआ। कश्यप से विवस्वान और विवस्वान के पुत्र वैवस्त मनु थे। विवस्वान को ही सूर्य कहा जाता है।   2. पत्नी-पुत्र   विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा विवस्वान् की पत्नी हुई। उसके गर्भ से सूर्य ने तीन...

द्वारकाधीश के मंदिर में क्यों नहीं है रुक्मणीजी की मूर्ति...? कारण है एक श्राप

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द्वारकाधीश के मंदिर में क्यों नहीं है रुक्मणीजी की मूर्ति...? कारण है एक श्राप द्वारकाधीश श्री कृष्ण को हम जब भी याद करते हैं तो हमारे मुंह से राधे-कृष्ण ही निकलता है। कृष्ण के साथ राधा का नाम ऐसे जुड़ा हुआ है मानो ये दोनों नाम कभी अलग थे ही नहीं। लेकिन सत्य तो ये भी है कि राधा और कृष्ण कभी एक नहीं हो सके ये और बात है कि कुछ किवदन्तियों के अनुसार, दोनों की शादी हुई थी लेकिन ज्यादातर कथाओं के अनुसार, इन दोनों का प्रेम कभी पूरा नहीं हो सका था। द्वारकाधीश कृष्ण का विवाह रूक्मणी से हुआ था इसके अलावा भी उनकी कई  रानियां और पटरानियां थीं। कृष्ण और रूक्मणी का रिश्ता भी आदर्श माना जाता है लेकिन क्या आप जानते हैं द्वारकाधीश के मंदिर में उनकी प्रिय रानी रूक्मणी की एक भी मूर्ति नहीं है। वास्तव में, इसका कारण एक श्राप है जिसके कारण कृष्ण और रूक्मणी को 12 साल तक अलग रहना पड़ा था और इसी कारण इस मंदिर में उनकी कोई प्रतिमा भी नहीं है। द्वारकाधीश द्वारकाधीश मंदिर से कुछ किलोमीटर दूर एक अलग हिस्से में रूक्मणी का मंदिर बना हुआ है। एक समय तक यहां आने वाले भक्तों को इस श्राप की कथा सुनाई जाती थी। अगर ध...

भगवान के ह्रदय की विशालता

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                    भगवान के ह्रदय की विशालता         एक बार नारद जी के मन में एक विचित्र सा कौतूहल पैदा हुआ।उन्हें यह जानने की धुन सवार हुई कि ब्रह्मांड में सबसे बड़ा और महान कौन है?         नारद जी ने अपनी जिज्ञासा भगवान विष्णु के सामने ही रख दी। भगवान विष्णु मुस्कुराने लगे।फिर बोले, नारद जी सब पृथ्वी पर टिका है। इसलिए पृथ्वी को बड़ा कह सकते हैं। और बोले परंतु नारद जी यहां भी एक शंका है।        नारद जी का कौतूहल शांत होने की बजाय और बढ़ गया। नारद जी ने पूछा स्वयं आप सशंकित हैं फिर तो विषय गंभीर है। कैसी शंका है प्रभु ? विष्णु जी बोले, समुद्र ने पृथ्वी को घेर रखा है। इसलिए समुद्र उससे भी बड़ा है।         अब नारद जी बोले, प्रभु आप कहते हैं तो मान लेता हूं कि समुद्र सबसे बड़ा है।यह सुनकर विष्णु जी ने एक बात और छेड़ दी, परंतु नारद जी समुद्र को अगस्त्य मुनि ने पी लिया था। इसलिए समुद्र कैसे बड़ा हो सकता है ? बड़े तो फिर अगस्त्य मुनि ही हुए।       ...

मन ही मन भगवान से क्या बातें करें क्या मांगे?

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            मन ही मन भगवान से क्या बातें करें क्या मांगे? 1 - हे मेरे स्वामी ! मेरी इच्छा कभी पूर्ण न हो... सदैव आपकी ही इच्छा पूर्ण हो... क्योंकि मेरे लिए क्या सही है... ये मुझसे बेहतर आप जानते हैं ।‼️ 2 - हे नाथ ! मेरे मन, कर्म और वचन से.. कभी किसी को भी थोड़ा सा भी दुःख न पहुँचे... यह कृपा बनाये रखें ।‼️ 3 - हे नाथ ! मैं कभी न पाप करूँ.. न होता देखूं.. न सुनू.. और न ही कभी किसी के पाप का बखान करूँ ।‼️ 4 - हे नाथ ! शरीर के सभी इन्द्रियों से आठो पहर... केवल आपके प्रेम भरी लीला का ही आस्वादन करता रहूँ ।‼️ 5 - हे नाथ ! प्रतिकूल से प्रतिकूल परिस्थिति में भी... आपके मंगलमय विधान देख सदैव प्रसन्न रहूँ ।‼️ 6 - हे नाथ ! अपने ऊपर महान से महान विपत्ति आने पर भी... दूसरों को सदैव सुख ही दिया करूँ ।‼️ 7 - हे प्रभु ! अगर कभी किसी कारणवश... मेरे वजह से किसी को दुःख पहुँचे... तो उसी समय उससे हाथ जोड़कर क्षमा माँग लूँ ।‼️ 8 - हे प्रभु ! आठो पहर रोम रोम से... केवल आपके नाम का ही जप होता रहे ।‼️ 9 - हे प्रभु ! मेरे आचरण श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस के अनुकूल हों ।‼️ 1...

हमारा सफर - श्री राम से श्री कृष्ण और कलयुग में

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  हमारा सफर - श्री राम से श्री कृष्ण और कलयुग में भी जारी श्री राम का घर छोड़ना एक षड्यंत्रों में घिरे राजकुमार की करुण कथा है और कृष्ण का घर छोड़ना गूढ़ कूटनीति। राम जो आदर्शों को निभाते हुए कष्ट सहते हैं, कृष्ण षड्यंत्रों के हाथ नहीं आते बल्कि स्थापित आदर्शों को चुनौती देते हुए एक नई परिपाटी को जन्म देते हैं। श्री राम से श्री कृष्ण हो जाना एक सतत प्रक्रिया है। श्रीराम को मारीच भ्रमित कर सकता है लेकिन कृष्ण को पूतना की ममता भी नहीं उलझा सकती। श्रीराम अपने भाई को मूर्छित देखकर ही बेसुध बिलख पड़ते हैं लेकिन कृष्ण अभिमन्यु को दांव पर लगाने से भी नहीं हिचकते। राम राजा हैं कृष्ण राजनीति राम रण हैं कृष्ण रणनीति। श्री राम मानवीय मूल्यों के लिए लड़ते हैं श्री कृष्ण मानवता के लिए।  श्री राम धर्म है तो श्री कृष्ण धर्म स्थापना  हर मनुष्य की यात्रा राम से ही शुरू होती है और "समय" उसे कृष्ण बनाता है। व्यक्ति का कृष्ण होना भी उतना ही जरूरी है जितना राम होना लेकिन राम से प्रारंभ हुई यह यात्रा तब तक अधूरी है जब तक इस यात्रा का समापन कृष्ण पर न हो.!! ।।जय राम कृष्ण हरे।।

राम नाम की शक्ति क्या होती हैं

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                     राम नाम की शक्ति क्या होती हैं जब प्रभु राम जी को समुद्र देवता ने बतलाया, कि हे भगवन् आपकी ही सेना में नल और नील नाम का दो बानर है जो पुल निर्माण करने में अति कुशल है।आप उन दोंनों की सहायता से सेतु का निर्माण कराकर लंका तक आसानी से पहुँच जायेंगें। तब राम जी ने दोनों को बुलाकर सेतु निर्माण का आदेश दिया और सभी बानर पत्थर उठा उठकर लाने लगे। ,हनुमान जी उन पत्थरों पर राम राम लिखते जाते और नल तथा नील उसे ले जाकर समुद्र में गिराते जाते। इस प्रकार जो भी पत्थर समुद्र में गया सभी के सभी एक दुसरे से जुड़कर उपलाते हुए सेतु के रूप में बँधते रहे।सेतु निर्माण कार्य बहुत द्रुत गति से सुचारू रूप से चल रहा था।प्रभु राम को शाम की वेला में सेतु बंधन कार्य की प्रगति के बारे में बता दिया गया।हनुमान ने बताया कि भगवन ,सभी पत्थरें आपका नाम लिखकर समुद्र में डालने पर वे सभी आपस में जुड़कर सेतु के रूप में हो जा रहे हैं। इस प्रकार सेतु निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है। परन्तु ज्यों ज्यों रात होती गयी प्रभु राम जी की बैचेनी बढ़ती गयी।उन्हें आ...