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श्रीमद् भागवत गीता हिंदी में चौथा अध्याय का शेष

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        श्रीमद् भागवत गीता हिंदी में चौथा अध्याय           ( स्वामी रामसुखदास जी के श्रीमुख से)  भगवान्  ' विवस्वते   प्रोक्तवान् ’  पदोंसे साधकोंको मानो यह लक्ष्य कराते हैं कि जैसे सूर्य सदा चलते ही रहते हैं अर्थात् कर्म करते ही रहते हैं और सबको प्रकाशित करनेपर भी स्वयं निर्लिप्त रहते हैं, ऐसे ही साधकोंको भी प्राप्त परिस्थितिके अनुसार अपने कर्तव्य-कर्मोंका पालन स्वयं करते रहना चाहिये (गीता—तीसरे अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक) और दूसरोंको भी कर्मयोगकी शिक्षा देकर लोकसंग्रह करते रहना चाहिये; पर स्वयं उनसे निर्लिप्त (निष्काम, निर्मम और अनासक्त) रहना चाहिये।  सृष्टिमें सूर्य सबके आदि हैं। सृष्टिकी रचनाके समय भी सूर्य जैसे पूर्वकल्पमें थे, वैसे ही प्रकट हुए— ' सूर्या -  चन्द्रमसौ   धाता यथापूर्वमकल्पयत् ’। उन (सबके आदि) सूर्यको भगवान्ने अविनाशी कर्मयोगका उपदेश दिया। इससे सिद्ध हुआ कि भगवान् सबके आदिगुरु हैं और साथ ही कर्मयोग भी अनादि है। भगवान् अर्जुनसे मानो यह कहते हैं कि मैं तुम्हें जो कर्मयोगकी बात...

श्रीमद् भागवत गीता हिंदी में अध्याय 4

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अध्याय :  4   |  श्लोक :  1 जय श्री राधे अभी तक श्रीमद् भागवत गीता हिंदी में तीसरे अध्याय तक जो भावार्थ था वह थोड़ा समझने में कठिन लग रहा था, इसलिए अब मैं स्वामी रामसुखदास जी के श्रीमुख से कहीं गई श्रीमद्भागवत गीता साधक संजीवनी को आप सबके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं आशा करती हूं इसे समझने में आपको सुविधा रहेगी जय श्री राधे श्रीभगवानुवाच इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।         विवस्वान्मनवे प्राह         मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥ १॥ मैंने इस अविनाशी योग (कर्मयोग)-को सूर्यसे कहा था। (फिर) सूर्यने (अपने पुत्र) (वैवस्वत) मनुसे कहा (और) मनुने (अपने पुत्र) राजा इक्ष्वाकुसे कहा। ' इमं   विवस्वते   योगं   प्रोक्तवानहमव्ययम् ’ —भगवान्ने जिन सूर्य, मनु और इक्ष्वाकु राजाओंका उल्लेख किया है, वे सभी गृहस्थ थे और उन्होंने गृहस्थाश्रममें रहते हुए ही कर्मयोगके द्वारा परमसिद्धि प्राप्त की थी; अत: यहाँके  ' इमम् ,  अव्ययम् ,  योगम् ’  पदोंका तात्पर्य पूर्वप्रकरण...

श्रीमद भगवत गीता में कर्म योग का शेष भाग

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             श्रीमद्भागवत गीता में कर्म योग की व्याख्या यहां भी निश्चित ’ कहा और दूसरे अध्यायके सातवें श्लोकमें भी ‘निश्चितम्’ कहा है। भाव यह है कि मेरे लिये कल्याणकारक अचूक रामबाण उपाय होना चाहिये। वहाँ अर्जुनने प्रश्न करते हुए कहा— ‘ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन’ (३। १); यहाँ ‘ज्यायसी’ पद है। इस ज्यायसीका भगवान्ने ‘कर्मज्यायो ह्यकर्मण:’ (३। ८)में ‘ज्याय:’ कहकर उत्तर दिया कि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है। यहाँ भगवान्ने भीख माँगनेकी बात काट दी। तो फिर कर्म कौन-सा करे ? इसपर बतलाया कि जो स्वधर्म है, वही कर्तव्य है; उसीका आचरण करो। अर्जुनके लिये स्वधर्म क्या है ? युद्ध करना। १८वें अध्यायके ४३वें श्लोकमें भगवान्ने क्षत्रियके जो स्वाभाविक कर्म बतलाये हैं, क्षत्रिय होनेके नाते अर्जुनके लिये वे ही कर्तव्यकर्म हैं। वहाँ भी भगवान्ने ‘श्रेयान् स्वधर्मो विगुण:’—(१८। ४७) कहा है। स्वधर्मका नाम स्वकर्म है। यहाँ स्वकर्म है—युद्ध करना। ‘स्वधर्म:’ के साथ ‘विगुण:’ विशेषण क्यों दिया ? अर्जुनने तीसरे अध्यायके पहले श्लोकमें युद्धरूपी कर्मक...

कर्म योग का जीवन में महत्व

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                                    कर्मयोग समतापूर्वक कर्तव्यकर्मोंका आचरण करना ही कर्मयोग कहलाता है। कर्मयोगमें खास निष्कामभावकी मुख्यता है। निष्कामभाव न रहनेपर कर्म केवल ‘कर्म’ होते हैं; कर्मयोग नहीं होता। शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म करनेपर भी यदि निष्कामभाव नहीं है तो उन्हें कर्म ही कहा जाता है, ऐसी क्रियाओंसे मुक्ति सम्भव नहीं; क्योंकि मुक्तिमें भावकी ही प्रधानता है। निष्कामभाव सिद्ध होनेमें राग-द्वेष ही बाधक हैं— ‘तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ’ (गीता ३। ३४); वे इसके मार्गमें लुटेरे हैं। अत: राग-द्वेषके वशमें नहीं होना चाहिये। तो फिर क्या करना चाहिये ?— श्रेयान् स्वधर्मो विगुण: परधर्मात् स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह: ॥ (गीता ३। ३५) —इस श्लोकमें बहुत विलक्षण बातें बतायी गयी हैं। इस एक श्लोकमें चार चरण हैं। भगवान्ने इस श्लोककी रचना कैसी सुन्दर की है ! थोड़े-से शब्दोंमें कितने गम्भीर भाव भर दिये हैं। कर्मोंके विषयमें कहा है— ‘श्रेयान् स्वधर्मो विगुण:’ यहाँ ‘श्रेयान्’ क...

एक संत की अमृत वाणी

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                         एक संत की अमृत वाणी(आत्म - दर्शन ) संत श्री रामसुखदास जी ने कल्याण मैगजीन में अपने श्री मुख से आत्मदर्शन के ऊपर प्रवचन दिए- उस परमात्मा का बहुत-बहुत शुक्रिया अदा करना है जिसने हमें यह बहुमूल्य मानव शरीर दिया है। वरना पशु-पक्षी की योनि मिलने पर किसी अन्य के सहारे को स्वीकारना पड़ता। इस शुभ अवसर को पाकर कितना अच्छा होगा कि हम अपनी   पहचान कर लें। वैसे तो दुनिया में मनुष्य के लिए जानने और मानने में कोई कमी नहीं है। बहुत विस्तार से वह ना जाने कितनी खोजकर्ता जा रहा है किसी ने हवाई जहाज उड़ा दिया तो किसी ने रेडियो-टीवी, कंप्यूटर जैसी आश्चर्यजनक चीजें जुटा डाली हैं फिर भी उसकी समझ का अंत नहीं आया, उसे स्वर को तो जाना समझा ही नहीं कि आखिर मेरा लक्ष्य क्या है? मनुष्य को सबसे बड़ा डर है वह मौत का! जो जन्म के बाद क्रमशः हर पल प्रत्येक सांस पर हो रही है चाहे ब्रह्माजी ही क्यों ना हो। अतः इस बहते हुए जीवन से कुछ ऐसा प्राप्त कर लें, जिसका कभी विनाश ना हो। प्रत्येक व्यक्ति अपने आप को बहुत हल्का ब...

मन में अच्छे विचार कैसे लाने चाहिए

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                       मन में अच्छे विचार कैसे लाने चाहिए मन तो चंचल है यह बात सभी जानते हैं , परंतु हमें चाहिए कि हम सदैव अपने मन में केवल सकारात्मक विचार ही लाएं। सकारात्मक सोच जब आपकी रहेगी तो मन प्रसन्न रहेगा और जब मन प्रसन्न रहेगा तो सेहत पर इसका सीधा असर पड़ेगा और सेहत अच्छी रहेगी। इसके विपरीत अगर हम नकारात्मक विचारों को ही सोचते रहेंगे, तो बेचारा दुखी मन सेहत पर भी प्रभाव डालेगा और सेहत खराब होने लगेगी। अनेक प्रकार की बीमारियों से ग्रस्त हो जाएंगे और उसका सीधा असर यह होगा कि आपको अपनी जिंदगी रोचक नहीं लगेगी, भार लगने लगेगी, साथ ही साथ अधिक बीमारियां के घेरे में आप कैद हो जायेंगे। डॉक्टर, दवाई का साथ मजबूत हो जाएगा और अंत में जीवन जीने की ललक नहीं रहेगी। अतः आप कम से कम अपने स्वंय के स्वार्थ के लिए ही केवल प्रतिफल सकारात्मक सोच को अपने पवित्र मन में स्थान दें। इस बात पर जरा भी संदेह नहीं है कि आपके विचारों का प्रभाव आपके मन पर पड़ता है। इस मानव जीवन को अच्छा व्यतीत करने के लिए प्रतिफल केवल अच्छे-अच्छे विचार मन में स...

शत्रुता खत्म करने के लिए नरसिंह स्तुति का जाप करें

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                         श्री नरसिंह स्तुति (इस मंत्र का नित्य जप करने से शत्रु का नाश होता है व दुष्ट की दुष्टता खत्म हो जाती है,) स्वस्त्यस्तु विश्वस्य खल: प्रसीदतां ध्यायन्तु भुतानि शिवं मिथो धिया। मनश्च भद्रं भजतादधोक्षजे आवेश्यतां नो मतिरप्यहैतुकी॥ अथार्त्- समग्र विश्व का कल्याण हो, दुष्ट भी प्रसन्न हो जाएं (दुष्टों की दुष्टता समाप्त होकर उनमें साधुता का उदय हो, क्योंकि जब तक वह दुष्टता की आग में जलते रहेंगे तब तक प्रसन्न कैसे रह सकते हैं?) सभी प्राणी परस्पर एक दूसरे के कल्याण का चिंतन करें। हमारा मन शुभ संकल्प करने वाला हो और हे इंद्रियातीत भगवान नृसिंह! हमारी निष्काम बुद्धि निरंतर आप में ही लगी रहे। अगर आप संस्कृत में इसका जाप नहीं कर सकते, तो आप हिंदी में अनुवाद के द्वारा भी स्तुतिं  भी कर सकते हैं। आपकी भाषा कोई भी हो ईश्वर सब समझ जाते हैं इसलिए केवल हृदय से प्रार्थना कीजिए।