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                                         सीमा के भीतर असीम प्रकाश                                    


प्रश्न-श्रोता -संसार में जो कुछ हो रहा हैं ,भगवान की मर्जी  से हो रहा हैं;अत: हम जो भी कार्य करते हैं,भगवान की मर्जी से करते हैं। इसलिए हमे पाप पुण्य नहीं लगने चाहिये।



स्वामीजी - एक करना होता हैं ,एक होना होता हैं। ये दो अलग -अलग विभाग हैं ज़ेसे ,आप व्यापार  करते हैं ,पर नफा-नुकसान आप करते नहीं बल्कि नफा -नुकसान हो जाता हैं। करना मनुष्य के हाथ में हैं ,होना भगवान के हाथ में  हैं। भगवान करते हैं अथवा करवाते हैं ,यह बात हैं ही नहीं। यदि ऐसा होता तो गुरु ,शास्त्र,शिक्षा ,उपदेश सब निर्थक होते।  अत: भगवान की मर्जी से होता हैं ,भगवान करते नहीं हैं। 
करने का पाप लगता हैं ,होने का पाप-पुण्य नहीं लगता। भगवान पाप नहीं कराते अपितु कामना ही पाप कराती हैं। भोगो की इच्छा के कारण ही मनुष्य पाप अन्याय करता हैं।  




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